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Sunday, May 22, 2011

यह लालच मरता क्यों नहीं?

छठी में एक कहानी पढ़ी थी। लालची कुत्ते की 'ग्रीडी डॉग'। पढ़ी अंग्रेजी में थी पर याद हिंदी में है। लालच के बहकावे में आकर कुत्ते ने अपनी परछाई से ही दूसरी रोटी पाने की कोशिश की। इस चक्कर में उसने अपने पास वाली रोटी भी गंवा दी थी। तब तब शायद लालच छोटा रहा होगा इसलिए कुत्ते के माध्यम से इसे समझाया गया था। अब स्थितियां उलट है। कुत्ते समझदार हो गए हैं, इंसान लालची। कहानी वही है, बस पात्र बदल गए हैं।
अब कहानी कुछ यूं होती है-एक महिला होती है। नाम इसलिए नहीं दिया है कि किसी से मेल खा गया तो वो लडऩे मेरे घर तक आ जाएंगी। वह महिला एक दिन बस स्टैंड पर खड़ी होती है। उनके पास एक अन्य महिला और उसकी कथित बेटी आती हैं। दोनों उसे बताती हैं कि उन्हें बस में एक सोने के मोतियों की माला मिली है। कुछ बदमाशों ने माला देख ली, इसलिए मेरे पीछे पड़े हैं। मैं इसे बेचती तो नहीं लेकिन क्या करूं, कोई चीज जान से तो बढ़कर नहीं होती ना! मैं किसी तरह बदमाशों से नजर बचाकर आई हूं! मैं इसे बेचना चाहती हूं। आप ले लीजिए। महिलाजी की लालच से जीभ लपलपा गई।  खट से अपने गहने उतार कर दे दिए। कम बताने पर खरीदारी के लिए लाए बीस हजार रुपए भी थमा दिए। बड़ी राजी (खुश) होते हुए घर पहुंची। घरवाळा भी खुशी से नाचने लगा। अपनी लुगाई की चतुराई पर ऐसा राजी हुआ कि घर वाळों के सामने उसकी ओर तिरछी नजर से भी नहीं देखने वाले ने लपक कर उसका माथा चूम लिया। ये और बात है कि बाद में शरमा के बाहर निकल गया। खुशी के पंखों पर सवार दोनों लोग-लुगाई सुनार के पास पहुंचे। सुनार ने जो बताया सुनकर दोनों के होश उड़ गए। सुनार ने उन्हें सपनों के संसार से उठाकर हकीकत की कठोर जमीन पर पटक दिया था। वो सोने के मोतियों की माला नकली थी। लुगाई की तारीफ कर रही जबान अब काफी कड़वी हो चली थी। लालच दोनों को देखकर मुस्करा रहा था। आज उसने इंसान को भी जीत लिया था। इस विजय ने उसे और ताकतवर बना दिया था। उसे इंसान की कमजोरी पकड़ में आ गई थी। वो समझ गया था कि इंसान जब दूसरे के साथ धोखाधड़ी होती है तो वह बहुत अफसोस करता है। उफनता भी है। उसकी नादानी पर फिकरे कसता है। उन्हीं परिस्थियों के बीच जब खुद पहुंचता है तो सारी समझदारी धरी रह जती है और वह भी लालच से मार खाकर रुदन करता लौटता है।
सवाल उठता है, यह मरता क्यों नहीं है? यह खुद नहीं मरता तो इसे मार क्यों नहीं देते? ऐसा नहीं है कि इंसान ने इससे लडऩे की कोशिश नहीं की। बहुत की, पर इसे बाली का सा (के जैसा) वरदान प्राप्त है। बाली को तो जानते हैं ना! रामायण में जिसका जिक्र है। उसके सामने जो भी मुकाबले के लिए खड़ा होता था उसका आधा बल उसमें आ जाता था। भगवान राम को भी उसे मारने के लिए छिपकर तीर चलाना पड़ा था। बाली का सा वरदानधारी यह लालच आए दिन शिकार कर-कर के पोषित होता आज रावण का सा अमर हो गया है। इसे मारने के लिए किसी राम को ही अवतार लेना पड़ेगा, पर यह कलयुग है। पता नहीं राम आएंगे कि नहीं। कल्कि का इंतजार है।

Thursday, February 3, 2011

तुम क्यों हार गई कविता...

जिंदगी से अभी तुम्हारी जंग शुरू भी नहीं हुई थी। अभी तो तुम अपने मां-बाप के कंधों पर खेल रही थी। अच्छी पढ़ाई कर रही थी। आने वाले दिनों में तुम एक ऐसे सफर पर जाने वाली थी जहां तुम्हें लोगों की जिंदगी बचानी थी। तुम्हारे पेशे में तो लोगों को बहादुर बनाया जाता है, ताकि वे मरते हुए लोगों को बचा सकें। उन्हें आशावादी बनाया जाता है ताकि वे मरते हुए आदमी के मन में भी जिंदगी के प्रति ललक पैदा कर सकें। फिर आधे सफर तुम कायर कैसे हो गई। एक चुन्नी का फंदा क्यों तुम्हें मुक्ति दाता लगा। अगर कहीं कोई टीस थी मन में तो तुम लड़ी क्यों नहीं। अपने भीतर की पूरी ताकत बटोरकर पछाड़ देना था उसे। बताओ न तुम लड़ी क्यों नहीं। तुम क्यों हार गई कविता...।
(नर्सिंग छात्रा के आत्महत्या करने की खबर पढ़ी तो मन में यही सवाल उभरा)

Saturday, January 29, 2011

काश! पलक जानती-यह तीली कितना जलाती है

शिवराज गूजर
एक आठ साल की बच्ची पलक के बस में जिंदा जल जाने की खबर ने अंदर तक हिला कर रख दिया। खबर यूं थी कि -बच्ची ने पिता द्वारा सिगरेट के पैकेट के साथ छोड़ी गई माचिस के साथ बाल-सुलभ छेडख़ानी की। तीली जली, मजा आया और वो खेलने लगी। खेल-खेल में कब कपड़ों में आग लगी पता नहीं चला। सोचकर देखिए, क्या वो पिता अपने आपको कभी माफ कर पाएगा जिसकी-सिगरेट पीने की आदत ने उससे प्यारी सी बेटी छीन ली। माचिस की तीली जब-जब उसके हाथ में आएगी दिल के किसी न किसी कोने में अपनी बेटी के लिए हूक जरूर उठेगी।
बच्चों के प्रति लापरवाही की यह अकेली घटना नहीं है। ऐसे वाकये आए दिन सुनने और पढऩे को मिलते रहते हैं। हम और आप ही में से किसी की छोटी सी गलती या तो पलक जैसे मासूम की जान ले लेती है या  फिर उसे जिंदगी भर का दर्द दे जाती है। काश! पलक यह जानती कि माचिस की तीली से निकली आग कितनी भयानक हो सकती है। अगर उसे पता होता तो वह शायद छूती भी नहीं।
...क्योंकि हम मनुष्य हैं
जहां तक मैं समझता हूं, मां-बाप होने का मतलब सिर्फ इतनाभर नहीं होता कि हमने उसे पैदा किया और बढ़ा कर दिया। अपने बच्चों का लालन-पालन तो जानवर भी जी लगाकर करते हैं। उसे जिंदगी जीने लायक बनाना और अच्छे - बुरे का ज्ञान कराना भी जन्म देने वालों के ही जिम्मे है, क्योंकि हम मनुष्य हैं। हम एक समाज में रहते हैं और समाज के अपने कुछ नियम कायदे हैं। अगर समाज में रहना है तो उन्हें फॉलो करना ही होगा।
अजनबियों की न सुनें, न उनका दिया कुछ खाएं
कुछ ही दिनों में ऐसी कुछ घटनाएं जयपुर में देखने को आईं, जिनमें बच्चों को उनके मां-बाप की मौत का भय दिखा कर ठग जेवर व नकदी उड़ा ले गए। उन्होंने यह बात घरवालों को भी नहीं बताई क्यों कि उन्हें डराया गया था कि ऐसा करने से संकट  जल्द आ सकता है। इन घटनाओं में बच्चों की क्या गलती बताएं-सबकी तरह वे भी अपने मां-बाप को बहुत प्यार करते हैं और उन्हें नहीं खोना चाहते थे। माता-पिता या अन्य परिजनों को चाहिए था कि वे बच्चों को बताते कि किसी भी अजनबी से रास्ते में बात नहीं करें। अगर कोई रुपए पैसे की मांग करे तो समझ जाना चाहिए कि यह कोई गलत आदमी है और वे उसकी बात मानने का दिखावा करते हुए वहां से चल दें और इसकी सूचना घर पर दें। यह भी समझाएं कि कोई अगर कुछ खाने को दें तो इनकार कर देें। ऐसा नहीं भी कर पाएं तो लेकर रख लें खाएं नहीं, बाद में उसे कहीं फेंक दें। ऐसा इसलिए करें-क्योंकि आजकल बच्चों के अपहरण में लिप्त गिरोह टॉफी या अन्य खाने की चीजों का लालच देकर भी बच्चों को बहलाते हैं।
विकृत मानसिकता वालों से रहें दूर
विकृत मानसिकता वाले लोगों के संबंध में भी बच्चों को जागरूक बनाएं। उन्हें ऐसे लोगों की हरकतों के बारे में समझाने के साथ ही इन परिस्थियों से निपटने को भी तैयार करें। ऐसे मामलों में बेटियों के प्रति खास सतर्क रहने की जरूरत है। इन दिनों जिस तरह की घटनाएं देखने में आ रही है, उस हिसाब से लड़कियों, खासकर छोटी उम्र की, को बाहर के लोगों से ज्यादा परिचितों से खतरा है। मेरा मतलब यह कतई नहीं है कि सभी परिचित ऐसे ही होते हैं, लेकिन यह तो मानोगे ना किसी के माथे पर शरीफ नहीं लिखा रहता। कहते हैं ना-लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।
जब घर में अकेले हों बच्चे
ऐसे दंपती जो नौकरीपेशा हैं, उनके लिए बच्चों के प्रति सजगता ज्यादा जरूरी है। उन्हें समझाएं कि जब वे अकेले हैं तो पीछे से घर पर आने वालों के लिए सीधा दरवाजा नहीं खोलें। पहले की होल से देखें-अगर अजनबी चेहरा है तो भीतर से ही मना कर दें। परिचित हो तो भी मम्मी-पापा के आने पर ही आने को कहें। सजगता के बावजूद भी यदि कुछ अनचाहा घट जाता है तो ऐसी परिस्थियों में घबराने की बजाय शांत रहें। पुलिस, दमकल और परिजनों जैसे महत्त्वपूर्ण नंबर लिखकर रखें ताकि ऐसे हालात में परेशानी नहीं हो। हां! पुलिस और दमकल जैसे नंबर देते समय बच्चों को इन विभागों की अहमियत समझाएं ताकि उनकी नासमझी से कोई परेशानी न हो।

Sunday, January 23, 2011

ऐसी भी क्या जल्दी है...

रेलवे फाटक बंद था। लोग अपने वाहन रोक कर खड़े थे, पर शायद उसे ज्यादा जल्दी थी। फाटक के बगल से उसने स्कूटी चढ़ा दी पटरी पर। अभी वह पटरी के बीचों-बीच थी कि ट्रेन आ गई। मौत उसकी आंखें के आगे नाचने लगी। इस वक्त जो उसने सबसे अच्छा काम किया वो यह था कि स्कूटी का मोह छोड़ पटरी के बाहर छलांग लगा दी। इधर वो गिरी और उधर स्कूटी पर से ट्रेन धड़ाधड़ करती निकल गई।
      यह एक अकली घटना नहीं है। यह तो बस ताजा उदाहरण है, ऐसे कितने ही प्रकरण रोज बासी हो जाते हैं। लोग खबर सुनते हैं, पढ़ते भी हैं और गुस्सा भी होते हैं पर क्षणिक। अगले चौराहे पर वही दुस्साहस खुद कर रहे होते हैं। पटरी के पास बसी कॉलोनियों-बस्तियों के लोग तो पटरी ऐसे पार करते हैं जैसे उनकी गली की सड़क हो। ट्रेन बिल्कुल करीब होती है और वे पटरी पर होते हैं। दो मिनट रुक कर ट्रेन को गुजर जाने देने से हालांकि उनका कोई बहुत बड़ा नुकसान मेरे हिसाब से नहीं होगा पर यह उनका रुटीन है।
     हाल कुछ ऐसे ही दिनभर लाल बत्ती पर भी नुमाया होते रहते हैं। स्टॉप लाइन तो बेचारी वाहन चालकों को बहुत पीछे से ताकती रहती है। बत्ती पीली नहीं होती उससे पहले तो सब ऐसे दौड़ पड़ते हैं जैसे कोई रेस चल रही हो। बत्ती कितने समय लाल रहेगी इसके लिए चौराहों पर टाइम मीटर लगाए हुए हैं। इनसे स्थिति ज्यादा बिगड़ रही है। लोगों का ध्यान बत्ती के बजाय इन पर होता है। जैसे ही मीटर 5-6 सैकंड पर पहुंचता है, लोगों की गाडिय़ां रफ्तार पकड़ चुकी होती हैं, जबकि दूसरी ओर से आने वाले अभी आधे चौराहे होते हैं।
       कई पैदल चलने वाले भी इनसे किसी मायने में कम नहीं है। जेब्रा क्रॉसिंग का तो उनके लिए कोई मतलब ही नहीं है। जिस जगह चल रहे होते हैं वहीं से घुमा देते हैं अपनी बॉडी। न आगे देखना न पीछे। बस भागकर पार कर जाना चाहते हैं सड़क। उनकी यही जल्दी दुर्घटना की सबसे प्रिय परिस्थिति है।
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि सबको यह जल्दी कहां जाने की है। अपने घर जाने की या भगवान के घर जाने की।

Tuesday, December 29, 2009

यह कैसी मस्ती?

यह कैसी मस्ती है, जिसमें घरवालों की भावनाओं का, अपने शरीर को होने वाली क्षति का कोई स्थान नहीं है।
मैं पुलिया के नीचे घुसने के लिए मोड़ पर मुड़ा ही था कि सामने से स्कूटी पर तेज गति से आ रही दो युवतियां मेरी बाइक से भिड़ते-भिड़ते बचीं। मेरा जी धक से रह गया। मेरी हड़बड़ाहट पर उनकी हंसी छूट गई। मुंह से हुरर्र करती हुई वो फुरर्र हो गईं। वो तो अपनी राह चली गईं लेकिन मुझे बहुत देर लगी खुद को संयत करने में। अभी-अभी बेटे को डेयरी से दूध दिलाकर घर के बाहर छोड़कर आया था। एक दम से पूरा परिवार आंखों के आगे घूम गया। मन के किसी कोने से सवाल उठा, मुझे कुछ हो जाता तो। सोचों के साथ-साथ मेरी बाइक भी बड़ी जा रही थी। मुझे पुलिया के ऊपर से होकर जाना था। घूमकर जब पुलिया पर चढऩे लगा तो दूसरी तरफ लगी भीड़ पर नजर गई। शायद कोई दुर्घटना हुई थी। अपना इलाका था, सो बाइक साइड में रोकी और वस्तुस्थिति जानने को उतरा। देखा एक आदमी स्कूटी उठा रहा था, और एक युवती का चेहरा खून से लथपथ और एक उसी की हमउम्र उसे संभाल रही थी। लड़की पलटी तो मुंख खुला का खुला रह गया। ये तो वही युवतियां थीं जो मुझसे टकराती-टकराती बचीं थी। बुझे मन से मैंने बाइक उठाई और चल दिया अपनी राह। मन में यही उथल-पुथल मची थी। यह कैसी मस्ती है, जिसमें घरवालों की भावनाओं का, अपने शरीर को होने वाली क्षति का कोई स्थान नहीं है।

Thursday, November 26, 2009

नई भोर आवाज दे रही है


Tuesday, February 3, 2009

वाह प्रीतो

अभिनेत्री प्रीटी जिंटा ने अपने जन्मदिन पर ऋषिकेश के मदर मिरेकल सकूल की ३४ लडकियॊं कॊ गॊद लिया है उनका यह कदम इसलिए भी महत्वपूरण हॊ गया है कि ये सभी लडिकयां अनाथ हैं समाज के लिए किया गया उनका यह यॊगदान अनुकरणीय है उम्मीद की जानी चाहिए कि दूसरे अभिनेता व अभिनेत्रियाँ भी जन्मदिनकी पार्टियों में अनाप-शनाप खर्च करने के बजाय इस तरह के सामाजिक यॊगदान का हिससा बनेंगे प्रीटी जिंटा इससे पहले भी मुंबई बम ब्लास्ट वाले मामले में निडर हॊकर गवाही देकर समाज के प्रति अपने संवेदनशील हॊने का परिचय दे चुकी हैं

Thursday, January 1, 2009

लोकल भाषा भी जानें

शहर मैं आने के बाद गाँव वाले भी शहर के रंग मैं रंग जाते हैं, यहाँ तक की उनका बोलना -चलना और रहन -सहन का डंग भी पूरी तरह बदल जाता है, ऐसे मैं उनके सहर वाले घर शिवराज पैदा होने वाला बच्चाभी पूरी तरह शहरी ही होता है, जब वे गाँव जाते हैं तो अजीब -अजीब सवाल करते हैं, मेरे एक परिचित के बच्चे ने तो बावडी को देख कर बड़ा विचित्र सा सवाल किया, अंकल ये अंडरग्राउंड मकान किसका है, यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी, मुझ पर ध्यान दिए बगेर वो बोला बरसात के दिनों मैं तो इसमें पानी भर जाता होगा, फिर ये लोग कहाँ जाते होंगे, जब मैंने उसे बताया की यह बनाई ही पानी के लिए ही गयी है, इसमें कोई नही रहता, इसे बावडी कहते हैं, वो बड़ा खुश हुआ और कहने लगा मैं अपने दोस्तों को बताऊँगा की मैंने सच की बावडी देखि है,
एक और अजीब किस्सा सुनिए, मैं बस से अजमेर जा रहा था, चालक के केबिन के पीछे वाली सीट पर जगह थी सो मैं वहीं
बेठ गया, रस्ते मैं दो लड़कियों को लघुशंका की शिकायत हुयी तो वे चालक की केबिन के पास आकर खड़ी हो गयीं. उन्होंने चालक से कहा की अंकल हमें टॉयलेट करनी है. चालक बेचारा ज्यादा पड़ा लिखा नही था, उसे कुछ समझ नही आया. सो वो बस मुस्करा कर रह गया, थोडी देर बाद उन्होंने फ़िर कहा अंकल बाथरूम करना है, चालक फ़िर मुस्करा कर रह गया, और बस अपनी रफ़्तार से रास्ता नापती रही, उनकी परेशानी बाद रही थी, यह देख मैंने चालक से कहा, की भाई साहब आपको सुने नही देता क्या ये बच्चियां कितनी देर से लघुशंका के लिए कह रही हैं, उसने साथ के साथ ब्रेक लगा दिए, फ़िर मुदा और हाथ जोड़ते हुए बोला, देविओं मैं कोने जानू अंग्रेजी, मैं समझया कोने की तुम काई खे रही छो, पिशाब के लिए खे देती तो इतरी परेशां तो कोणी होती, वो लड़किया शर्मिंदा सी होती हुयी नीचे उतर गयी लघुशंका के लिए,



Tuesday, December 30, 2008

कागजी योग्यता

दिल्ली के लिए नयी बस सेवा शुरु होनी थी, लंबा रूट होने के कारन चालक का परफेक्ट होना जरूरी था, इसको देखते हुए परिवहन निगम के अधिकारी ने रिकॉर्ड देख कर ऐसा चालक खोजने के निर्देश दिए जिसका अब तक का सेवा रिकार्ड बिल्कुल कलीन हो, जिस पर कोई चार्ज नही लगा हो,
काफी खोजबीन के बाद एक ५० वर्षीय चालक ऐसा मिला, ३० साल की सेवा मैं उसपर कोई चार्ज नही लगा था, उसका रूट १५ किलोमीटर दूर एक गाँव तक था, उसमें भी बीच मैं पड़ने वाले गावों मैं स्टाप थे, रूट पर ट्रफिक जैसी कोई प्रॉब्लम भी नही थी,
अधिकारी ने उसे सलेक्ट कर लिया, जब चालक को यह पता चला तो वह परेसान हो गया, वो कभी दिल्ली नही गया था, उसने साथियों से पूछा दिल्ली जाने मैं कितने दिन लग जाते हैं, नाईट स्टाप कहाँ होगा, यह जानना उसके लिए बहुत जरूरी था क्योंकि सात बजे बाद उसकी लाइटगुल हो जाती थी, लोगों ने समझा मजाक कर रहा है, सो किसी ने उसकी बात पर ध्यान नही दिया, कंडेक्टर ने जरूर आश्वासन दिया की वो रूट के बारे मैं परेशान न हो, कोई प्रॉब्लम होगी तो वो संभाल लेगा,
और फिर वो दिन भीआ गया , मंत्री जी ने हरी झंडी दिखाकर बस को रवाना किया, पाँच किलोमीटर ही बस चली होगी की चालक ने रोक दी, कंडेक्टर कुछ पूछता तब तक तो वह गायब हो चुका था झाडियों के पीछे. १५ मिनट मैं आया तब तक सवारियां कंडेक्टर का माथा खा चुकी थी, आते ही लोगों को गुस्सा देखा तो, फट पड़ा अब क्या मूतने भी नही जाऊं. ऐसी पता नही क्या देर हो रही है. खेर फ़िर बस रवाना हुई, धर कूंचा धर मंझला रास्ता फलांगती हुयी. इस एक घंटे के सफर मैं कितनी ही बार मूतना हो गया तो कितनी ही बार चाय पीना. और फ़िर मिडवे से पहले ही दिख गया एक दबा. बस क्या था रोक दी बस और जा पसरे खाट पर. अब तो लोगों के साथ साथ कंडेक्टर के भी गले तक आ गयी थी. उसने मुख्य बस स्टैंड पर फ़ोन कर दिया. स्थिति को भाँपते हुए दूसरा चालक भेजा गया तब जाकर बस रवाना हो सकी.
शिवराज गूजर

Sunday, December 14, 2008

छंटनी

मंदी की मार सबसे ज्यादा पड़ी है प्राइवेट कम्पनियों के कर्मचारियों पर, रातों की नींद उड़ गयी है, रात की पारी मैं काम करने वाले तो खेर पहले भी रात को नही सो पाते थे, लेकिन ये जगराता उससे अलग है, हर समय छंटनी की तलवार सर पर लिए काम करना, कुछ कम हिम्मत का काम नही है भाई, मेरे एक कार्टूनिस्ट दोस्त ने उनका दर्द कुछ इस तरह से व्यक्त किया,

शिवराज गूजर

Sunday, December 7, 2008

बस नाम बदलने हैं

आज राजस्थान विधानसभा चुनाव के परिणाम आ जायेंगे, दो चार दिन मैं सरकार भी बन जायेगी, लेकिन होगा क्या, कुछ भी नही, वही पुराने चावल होंगे, ये जरूर है कि कुछ दाने नए हों, लेकिन उससे फर्क क्या पड़ेगा स्वाद मैं, मंत्री तो वरिष्ठ ही बनेंगे, नयों को मोका मिलेगा तो वो भी अपने बड़ों के पदचिन्हों पर ही चलेंगे, ऐसे मैं क्या उम्मीद कि जा सकती है, नयेपन की, राज्य मैं बीजेपी आयी तो सेण्टर के माथे सारे कांड, कांग्रेस आयी तो वो ही पुराना जुमला पिछली सरकार ऐसा बिगाड़ गयी है सुधरने मैं तो वक़्त लगेगा ही,
कुछ नही बदलने वाला है दोस्त, तुम चाहे कितना ही चाहलो, बदलना भी चाहो तो आप्शन नही है मेरे दोस्त, चुनना तो उनमें से ही है न जो चुनाव लड़ रहे हैं,
शिवराज गूजर

Friday, November 7, 2008

इसलिए है पत्रकारों मैं खुजली

आज प्रेसक्लब में कोफी के साथ बातों का दौर चल रहा था, बातों-बातों में बात पत्रकारों में एक -दूसरे की टांग खींचने की प्रवृति पर आ गयी, अशोक थापलियालजी ने इसका बड़े मजेदार ढंग से विवेचन किया, बोले यह खुजली अनलिमिटेड है,इसका सम्बन्ध पोरानिक काल से है, एक बार ब्रह्माजी की दाडी में खुजली हो गयी, तो सलाह मशविरे के बाद दाडी कटवाने का निर्णय लिया गया, हज्जाम बुलाया गया, हज्जाम रस्ते में नारद से टकरा गया, हड़बड़ी का कारन जाने बिना नारदजी उसे कहाँ छोड़ने वाले थे, सारीबात पता चलने पर उन्होंने हज्जाम से एक वचन ले लिया कि वो दाडी के बाल कहीं फेंकने के बजाय उन्हें लाकर देदे, हज्जाम ने ऐसा ही किया, नारदजी ने सारे बाल अपने कमंडल में डाले और मृत्यु लोक में छिड़क दिए, उससे जो जीव पैदा हुए वो पत्रकार बने, इसलिए सुनो छोरों ये खुजली अनलिमिटेड है, लाइलाज है, सो सब भूल -भाल कर मस्त रहो, लेट अस एन्जॉय,

शिवराज गूजर

Sunday, September 14, 2008

हमने तो पहले ही चेता दिया था

बचपन मैं सुना करते थे किडाकू किसी को भी लूटने से पहले इश्तेहार चिपका दिया करते थे, जिसमें लूट का दिन, किसके यहाँ लूट करेंगे और कब करेंगे यह सब लिखा रहता था, तय दिन को पूरी सुरक्षा व्यस्था को धता बताते हुए डाकू वारदात को अंजाम दे जाते थे और पुलिस हाथ मलती रह जाती थी, ऐसी कई फिल्में भी बनी थी जिनमें ये सब दिखाया गया था,
तब ये सब सुनते थे, आज देख रहे हैं, बदला है तो बस ये कि अब डाकू कि जगह आतंकवादी ने ले ली है और इश्तेहार की जगह मेल ने, उनके हलकारे कि जगह मीडिया ने ले ली है, जो उनके मेल को लेकर डिन्डोरा पीटता रहता है, जैसे ही आतंकवादी कहीं कोई वारदात करते हैं, सुरक्षा एजेंसियों का वही सदा गला बयान आ जाता है हमने तो पहले ही चेता दिया था, लगता है चेताने के आलावा इनका कोई काम ही नही रह गया है,

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