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Sunday, May 17, 2009

यूँ भी होता है

कई दिनों से कुछ नहीं लिख पाया इसलिए अपनी एक पुराणी लघुकथा पोस्ट कर रहा हूँ. कई साथी इसे पढ़ चुके होंगे, लेकिन यह उन्हें भी नया सा अनुभव देगी, क्योंकि यह रोज मर्रा की जिंदगी से जुडी हुयी है.
गोद मैं बच्चा लिए व हाथ मैं झोला लटकाए एक ग्रामीण महिला बस मैं चडी, सीट खाली नही देख एक दम से वह निराश हो गयी, फिर भी जैसा कि बस मैं चड़ने वाला हर यात्री सोचता है कि शायद किसी सीट पर अटकने कीजगह मिल जाए, वह भी पीछे की और चली, तभी उसकी नजर एक सीट पर पड़ी , उस पर बस एक युवक बेठा था, आंखों मैं संतोष की चमक आ गयी, पास जाने पर जब उस पर कोई कपडा या कुछ सामान नही दिखायी दिया तो उसने धम्म से शरीर को छोड़ दिया सीट पर,
अरे रे कहाँ बेठ रही हो, यहाँ सवारी आएगी,
आंखों मैं उभरी चमक घुप्प से गायब हो गयी , आगे और सीट देखने की हिम्मत उसमें नही रही और वह वहीं सीटों के बीच गैलरी मैं ही बेठ गयी, इसके बाद उस खालीसीट को देख कर कईं आंखों मैं चमक आती रही और बुझती रही,तभी एक युवती बस मैं चडी , अन्य लोगों को खड़ा देख उसने समझ लिया कि वह सीट खाली नही है, कोई आएगा, नीचे गया होगा, टिकेट या फिर कूछ लेने , और वह भी खड़ी हो गयी महिला के पास,
बेठ जाइये न, यहाँ कोई नही आएगा,
इस आवाज पर युवती ने मुड़कर देखा तो युवक उससे ही मुखातिब था,उसने आश्चर्य से पूछा कोई नही आएगा,
जी नही, युवक उसी मुस्कान के साथ बोला, इस पर युवती मुडी और नीचे बेठी उस बच्चे वाली महिला को वहां बेठा दिया,अब युवक का चेहरा देखने लायक था, वह युवती को खा जाने वाली नजरों से देख रहा था,
शिवराज गूजर

Wednesday, February 18, 2009

ऐसी भी क्या जल्दी है

शास्त्री नगर जाने वाली बस देख रामबाग पर खड़े शर्माजी एकदम से अलर्ट हो गए । बस मैं पैर रखने की भी जगह नही थी, ऐसे मैं जब शर्माजी दोड़ कर बस मैं चड़ने लगे तो कंडेक्टर ने उन्हें रोकने की कोशिश करते हुए कहा,
बिल्कुल भी जगह नही है भाई साहब । पीछे वाली मैं आ जाना ।
जब तक उसकी बात पूरी हुई शर्माजी भीड़ के बीच मैं फंसा चुके थे अपनी बोडी । एक पैर तो हवा मैं लटका हुआ चिल्लाता ही रह गया था मैं कहाँ टिकू ।
ऐसी भी क्या जल्दी है, पीछे वाली बस मैं आ जायें, जब जगह नही है तो जान जोखिम मैं डालने से क्या फायदा,
अगली सवारी को बस मैं चढ़ता देख शर्माजी बडबडा रहे थे ।
शिवराज गूजर

Sunday, February 15, 2009

यूँ भी होता है

गोद मैं बच्चा लिए व हाथ मैं झोला लटकाए एक ग्रामीण महिला बस मैं चडी, सीट खाली नही देख एक दम से वह निराश हो गयी, फिर भी जैसा कि बस मैं चड़ने वाला हर यात्री सोचता है कि शायद किसी सीट पर अटकने कीजगह मिल जाए, वह भी पीछे की और चली, तभी उसकी नजर एक सीट पर पड़ी , उस पर बस एक युवक बेठा था, आंखों मैं संतोष की चमक आ गयी, पास जाने पर जब उस पर कोई कपडा या कुछ सामान नही दिखायी दिया तो उसने धम्म से शरीर को छोड़ दिया सीट पर,
अरे रे कहाँ बेठ रही हो, यहाँ सवारी आएगी,
आंखों मैं उभरी चमक घुप्प से गायब हो गयी , आगे और सीट देखने की हिम्मत उसमें नही रही और वह वहीं सीटों के बीच गैलरी मैं ही बेठ गयी, इसके बाद उस खालीसीट को देख कर कईं आंखों मैं चमक आती रही और बुझती रही,
तभी एक युवती बस मैं चडी , अन्य लोगों को खड़ा देख उसने समझ लिया कि वह सीट खाली नही है, कोई आएगा, नीचे गया होगा, टिकेट या फिर कूछ लेने , और वह भी खड़ी हो गयी महिला के पास,
बेठ जाइये न, यहाँ कोई नही आएगा, इस आवाज पर युवती ने मुड़कर देखा तो युवक उससे ही मुखातिब था,
उसने आश्चर्य से पूछा कोई नही आएगा,
जी नही, युवक उसी मुस्कान के साथ बोला,
इस पर युवती मुडी और नीचे बेठी उस बच्चे वाली महिला को वहां बेठा दिया,
अब युवक का चेहरा देखने लायक था, वह युवती को खा जाने वाली नजरों से देख रहा था,
शिवराज गूजर

Wednesday, December 17, 2008

नास्तिक

मैं बस में बेठा बाहर हो रही बरसात का मजा ले रहा था

कोई आएगा इस पर

अजनबी आवाज सुनकर मैं मुडा, आवाज के मालिक पर नजर गई, उम्र यही कोई २५ -३० साल, आंखों पर नजर का चस्मा चड़ाये, महाशय सवालिया नजरों से मुझे देख रहे थे,

फिलहाल तो नही

मैंने उसका मुआयना करते हुए कहा,

आप कहाँ तक जायेंगे ?

उसने धम्म से बैठते हुए दूसरा सवाल दाग दिया,

टोडारायसिंह, और आप,

बात बढाने की गरज से मैंने पूछा

भांसू

उसकी बात ख़त्म होने के साथ ही बस झटके से आगे बाद गई, बस चलने के साथ ही बातों का सिलसिला चल निकला, बात चलते-चलते आ पहुंची दुनिया के सृजक पर , उसके अस्तित्व के होने न होने पर, इस बात को लेकर हम दोनों मैं बहस छिड़ गई, वह उसके अस्तित्व को पूरी तरह नकार रहा था, और मैं इस बात पर अदा था की वो इस दुनिया मैं है चाहे किसी भी रूप मैं हो। मेरे अपने तर्क थे तो उसकी अपनी काटें, इससेपहले की हमारी बहस उग्र होती ब्रेकों की चरमराहट के साथ ही बस रुक गयी, पता चला की नदी मैं पानी ज्यादा आ गया है, जो पुल पर से बह रहा है, ऐसे मैं बस पुल पर से नही गुजर सकती, पानी उतरने मैं देर लगनी थी सो हम भी उतर आए नीचे, नदी के दोनों और वाहनों की लाइन लगी थी, इधर वाले इस किनारे खड़े थे तो उधर वाले उस किनारे, तभी एक ट्रक आया, उसमें से चालक और खलाशी उतरे पानी का अंदाजा लगाया और ट्रक घुसा ले गए पानी मैं, देखते ही देखते ट्रक नदी के पार निकल गया,

यह देख हमारी बस के चालक को भी जोश आ गया और उसने भी घुसा दी बस पानी मैं, नदी के बीच मैं पहुँचते ही बस ने अचानक धक्का सा खाया, इसी के साथ पूरी बस श्रीजी के जयकारों से गूँज उठी,

सबसे पहले जय बोलने वाला मेरी बगल मैं बैठा वाही शख्स था जो पूरे रस्ते ऊपरवाले के अस्तित्व को नकार रहा था,

शिवराज गूजर



Wednesday, December 10, 2008

लिखे को कोन मानता है

बेचारी महिलाएं तो खड़ी हैं और ये कैसे फेलकर बेठे हैं,

मुडा तो देखा बगल वाली सीट पर बेठे सज्जन अपने साथी से मुखातिब थे, उन्होंने एक बार पूरी बस में नजर घुमाई] सायद अपनी बात का असर देख रहे थे, फिर बोले-

जबकि सीट के ऊपर साफ़ लिखा है -केवल महिलाओं के लिए,

उनकी बात ख़त्म होते-होते उनसे सहमत एक और सज्जन बोल पड़े-

ऐसा ही है भइया यह कलजुग है, लिखे को कौन मानता है, अब देखो न सबसे ज्यादा लघु शंका उस दीवार पर की गयी होती है जिस पर लिखा होता है, यहाँ पिसाब करना मना है,

एक और सज्जन बोल पड़े -

गुटखे पर साफ़ लिखा होता है -स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, फिर भी लोग खाते हैं ,

सबके साथ में भी उनकी बातों से सहमत होने लगा था, सोच रहा था सही कह रहे है ये लोग, हम लिखे पर कहाँ ध्यान देते हैं, तभी कशेले धुँए ने मेरी तंद्रा तोड़ दी, मैंने मुड़कर उस शोकीन को देखा जो बस में धुम्रपान कर रहा था, यह वही शख्स था जो
पूरे रास्ते लिखे हुए नियमों की जबरदस्त पैरवी कर रहा था. उसके सामने ही बस मैं लिखा था -धुम्रपान करना मना है.
शिवराज गूजर

Monday, November 17, 2008

डर

रामू नया -नया जयपुर आया था गाँव से , पुलिया के नीचे आदमियों की भीड़ ज्यादा दिखी तो वहीं बगल मैं लगा लिया मूंगफली का ठेला, अभी बोहनी भी नही हुयी थी किएक आदमी आया और ठेले मैं से मुठी भर कर मूंगफली उठाई और चलता बना, रामू ने उसे आवाज देकर पैसे के लिए कहा तो भद्दी सी गाली देते हुए रामू को मरने के लिए झपटा, रामू भी कोई कम नही था, अभी-अभी बीसवें साल मैं कदम रखा ही था, सरीर भी माता-पिता के लाड और झुमरी गायके दूध कि बदोलत आसपास के गाँव मैं किसी का नही था ऐसा पाया था, ऐसे मैं वो कहाँ दबने वाला था, एक ही दावमैं उस आदमी को जमीन दिखा दी, और फ़िर जो लगा दे दनादन जो उसे तबला बना दिया, तभी भीड़ मैं से कोई चिल्लाया
अरे ये तो बिल्लू दादा है , आब ये ठेले वाला तो गया कम से, दादा की इजाजत के बगेर तो इस इलाके मैं पत्ता भी नही हिलता,
रामू के हाथ जहाँ के तहां रुक गए, सीन बदल गया था, अब हाथ दादा के चल रहे थे और रामू गिडगिडा रहा था, माफ़ी मांग रहा था,
शिवराज गूजर

Sunday, November 9, 2008

भूख स्वाद नही देखती

पप्पू बुरी तरह घबरा गया था, हड़बड़ी मैं किसी और का आर्डर मिस्टर बवेजा को दे आया था, बवेजा का गुस्सा वो पहले देख चुका था, नमक कम होने पर ही वो कई बार खाना फ़ेंक चुका था, कंपकंपाता वो डाबा मालिक रामलाल के पीछे जाकर खड़ा हो गया, राम लाल ने उसे इसतरह खड़ा देखा तो डाँटते हुए बोला
अबे ओये पप्या यहाँ खड़ा-खड़ा क्या कर रहा है, ग्राहकों को क्या तेरा बाप देखेगा,
लेकिन पप्पू वहां से हिला तक नही, यह देख रामलाल समझ गया कि कुछ गड़बड़ हो गयी है, उसने पप्पू कों पुचकारा तो उसने सारीबात बता दी, मामला समझने के बाद रामलाल के चहरे पर भी चिंता कि लकीरें दिखाई देने लगी, लेकिन अब क्या हो सकता था,
अब क्या होगा दादा,
पप्पू ने डरते हुए पूछा,
वही होगा जो मंजूरेबवेजा होगा,
रामलाल इससे ज्यादा नही बोल सका,
तभी किसी ग्राहक ने आवाज दी,
हाँ भइया कितना देना है,
रामलाल ने देखा बवेजा काउंटर पर खड़ा था, लेकिन वह सामान्य नजर दिखाई दे रहा था, गुस्से का कोई भावः उसे नही दिखा, तो उसकी चिंता ख़त्म हो गयी और उसने पप्पू से पूछ कर पेमेंट ले लिया,
जब वह चला गया तो पप्पू रामलाल के पास आकर बोला,
आज तो कमल ही हो गया दादा, नमक कम होने पर ही थाली फ़ेंक देने वाला सादा खाना खाकर खाकर चला गया और वो भी बिना कुछ बोले,
भूकस्वाद नही देखती पप्या भूख मैं भाटे भी स्वादिस्ट लगते हैं,
पप्पू के कुछ समझ मैं नही आया था, लेकिन उसने समझने वाले अंदाज मैं सर हिला दिया,
शिवराज गूजर

Saturday, November 1, 2008

क्या इसी दिन के लिए लिया था गोद

क्या बताऊँ बीटा मैं तो अपने घर मैं ही बेगानी सी हो गयी, वो डोकरा (अपने पति की और इशारा करते हुए) भी बहुत दुखी है, पेरों से लाचार होने के कारन कुछ नही कर सकता, बस मुह से कहता रहता है, लेकिन सुने कोण, सब जगह ताले डालकर चाबी कमर मैं खोंस कर घूमती है महारानी, मेरे कोंसी तीन चार बेटियाँ है बस एक ही तो है लेकिन अभी से ही तरस गयी है मइके को, मैं इसे गोद नही लेती तो कम से कम एक ही दुःख होता की मेरे बेटा नही है, लेकिन अब तो मेरे सो दुःख हो गए हैं, क्या इसी दिन के लिए मैंने इसे गोद लिया था, यह कहते कहते काकी अपनी आंखों मैं आयी बाद नही रोक पाई और ओदनी के कोर से आंसू पोंछती हुयी, अपनी झुकी कमर को हाथ मैं पकड़ी लाठी पर संभालती हुई चलदी अपने घर.

Friday, October 24, 2008

मैं घर पर नही हूँ

राजू , अरे सुन तो बेटा,
मिसेज शर्मा की बात पूरी होने तक तो राजू जा चुका था दरवाजे से बाहर,
ये राजू भी न, जानकी देवी के बुलावे के बाद तो किसी की नही सुनता, मैं जब काम बताती हूँ तो ममा ये कर रहा हूँ , ममा वो कर रहा हूँ, लाख बहने हैं इसके पास,
बुदबुदाती हुई मिसेज शर्मा अपने काम मैं लग गयी,
उधर राजू जब जानकी देवी के पास पहुँचा तो वह खाना पकाने की तयारी मैं थी, राजू को देखते ही बोली,
सुबह तू कहाँ चला गया था,
वो मोसी के यहाँ चला गया था, क्यों कोई काम था,
हाँ वो सब्जी लानी थी, सुबह भी दाल ही बनाई,
अभी ले आऊंगा आंटी,
राजू का ध्यान जानकी देवी की बातों मैं कम और इधर उधर देखने मैं जयादा था, ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी को दूंद रहा हो, अंत मैं उससे रहा नही गया और उसने पूछ ही लिया,
आंटी , सीमा दिखाई नही दे रही आज,
अरे हाँ मैं तुम्हें बताने ही जा रही थी, वो सुबह पापा आए थे, उसे भी साथ ले गए, कह गए थे अबउसके गाँव की स्कूल मैं ही भरती कराएँगे,
ओह, अब कब आएगी,
आने का तो कुछ नही कह सकती बेटा, वो तो मेरे कहने से दामाद जी ने कुछ दिन के लिए मेरे पास छोड़ दिया था,
यह सुनते ही राजू बिना कुछ बोले चल दिया, बाहर की औरयह देख जानकी देवी ने उसे आवाज दी,
अरे बेटा, सब्जी तो ले आ,
बाद मैं देखूँगा आंटी, कल टेस्ट है पदाई करनी है।
राजू बुदबुदाता हुआ घर मैं घुसा तो मिसेज शर्मा ने पूछ लिया,
क्या हुआ बेटा, किस पर नाराज हो रहे हो,
कुछ नही ममा, लोग सबको अपनी तरह फालतू समझते हैं, जब देखो, बेटा ये ले आओ, बेटा वो ले आओ, आगे से जानकी आंटी कभी आवाज लगाये तो कह देना मैं घर पर नही हूँ,
शिवराज गूजर

Wednesday, October 15, 2008

मेरे सामने शरमा रही है

योन शिक्षा पर लिखी गयी पुस्तक के लेखक का टीवी के लिए इंटरव्यू चल रहा था, उन्होंने पुस्तक मैं पुरजोर तरीके से यह बात उठाई थी कि बच्चों को योन शिक्षा डायनिंग टेबल पर दी जानी चाहिए , अपने लेखन मैं उन्होंने अपनी धर्मपत्नी का बराबर का हाथ बताया था, जाहिर था उनके साथ उनकी अर्धांगिनी का भी इंटरव्यू जरूरी था, लेकिन वो बोलने मैं बार-बारअटक रही थी, हमने समझा वो कैमरे के सामने ख़ुद को असहज महसूस कर रही है सो उन्हें खोलने के लिए कहा, आप बोलिए मैडम, यह तो रिहर्सलहै फाइनल टेक बाद मैं लेंगे, तभी लेखक महोदय बीच मैं ही बोल पड़े, नही ऐसी कोई बात नही है, योन संबंधों की बात है न, इसलिए ये मेरे सामने झिजक रही है, यह कह कर वे भीतर चले गए, अब इंटरव्यू निर्बाध चल रहा था,
शिवराज गूजर

Sunday, September 21, 2008

विडम्बना

चांदपोल चलोगे,
इस शब्द ने जैसे कालू के कानो मैं सहद घोल दिया, वह अभी घर से रिक्शा लेकर बड़ी चोपड पहुँचा ही था, ऐसा कभी - कभार ही होता थाकि पहुँचते ही सवारी मिल जाए, कई बार तो घंटों इन्तेजार करना पड़ जाता था,
हाँ क्यों नही, बेठो, वो चहकते हुए बोला
कितना लोगे
पाँच रुपये
चांदपोल के पाँच रुपये
ज्यादा नही मांग रहा हूँ बाबूजी, बोहनी का वक्त है इसलिए पाँच ही मांग रहा हूँ, वरना तो छः रुपये से कम नही लेता,
रहने दे, सिखा मत, चार रूपये लेना है तो बोल, वरना अभी बस आने ही वाली है,
बस का नाम सुनते ही कालू कुछ दीला पड़ गया, फिर बोहनी करनी थी सो वह चार रुपये मैं सवारी को ले जाने के लिए तैयार हो गया,
सवारी के बैठते ही कालू ने चला दिए पेडल पर पैर ,
चांदपोल पहुंचकर सवारी जब उसे पाँच रुपये का नोट देने लगी तो उसने खुले नही होने की समस्या बताई
सवारी ने बुरा सा मुह बनाया, खुले नही है, मैं सब समझता हूँ, लेकिन मैं भी कम नही हूँ,
कहते हुए सवारी पास ही पान वाले कि दुकान पर चली गयी,
पान वाले ने कुछ लिए बगेर खुले देने से मन कर दिया, इस पर सवारी ने कहा, मैं कुछ खाता तो हूँ नही एक रुपये कुछ भी दे दे यार, वो रिक्शे वाले को किराया देना है,
पान वाले ने उसे एक गुटखा देते हुए खुले रुपये पकड़ा दिए,
सवारी ने गुटखा फाड़ कर मसाला मुह मैं डाला कालू को चार रुपये पकडाये और चल दी अपनी राह
कालू को ख़ुद पर ही हँसी आ गयी, एक रूपया जो उसका जायज हक़ थासवारी उसे देने के बजाय उससे एक ग़लत आदत की शुरुआत कर गयी,
उसने आसमान की और देखाऔर चला दिए पेडल पर पैर
शिवराज गूजर


Monday, July 28, 2008

लघुकहानी 3

सीट दो की है तो क्या हुआ, थोड़ा सा खिसक कर किसी को बेठा लेंगे तो क्या चला जाएगा ? इंसानियत भी कोई चीज होती है ,
बस मैं मेरी बगल मैं खड़े सज्जन सीटों पैर बेठे लोगों को कोसते हुए बडबडा रहे थे,
अगले स्टोपेज पर एक सवारी उतारी तो उन महाशय को भी सीट मिल गयी, वह भी मेरी तरह ही दुबले पतले से थे, सीट मैं थोडी जगह दिखाई दे रही थी, इससे मुझे भी थोडी उम्मीद जगी,
मैंने उनसे कहा भाईसाहब, थोड़ा खिसक जाओ तो मैं भी अटक जाऊं,
इतना सुनते ही वे भड़क गए,
बोले, सेट दो की है और हम दो ही बैठे हैं, कहाँ जगह दिख रही है तुम्हें ? अपनी सहूलियत देखते हैं सब, दूसरे की परेशानी नही समझाते,
अब मुझे समझ मैं आ गया था कि दो की सीट पर दो ही क्यों बेठे हैं,
शिवराज गूजर

Wednesday, July 16, 2008

लघुकहानी 2

उसकी बात और है

भूरी आंखों वाली औरतें बड़ीचालू होती हैं , एक सज्जन अपनी सगाई का एल्बम मित्र को दिखाते हुए औरतों की फितरत के बारे में बता रहेथे,

उसकी मंगेतर की फोटो देख मित्र ने कहा, भाई संभलकर रहना, जिससे तेरी शादी होने जा रही है वो भी भूरी आंखों वाली ही है,

उसकी बात और है यार , पहले वाले सज्जन झेंपते हुए बोले,

शिवराज गूजर

Thursday, June 5, 2008

लघुकहानी 1

नजरिया

देखो तो कैसे ठूंस -ठूंस कर भर रखी है सवारियां, कोई मरे तो मरे इनका क्या ? इन्हें तो बस सवारियों से मतलब,

आती जाती बसों की स्थिति पर बगल में खड़े शर्माजी कंडक्टरों और बस मालिकों को कोस रहे थे, इसी दौरान उनकी बस आ गईउसकी हालत औरों से ज्यादा ख़राब थी , शर्माजी बस की और लपके ,

मैंने कहा, शर्माजी बहुत भीड़ है, पीछे वाली मैं चले जाना ,

पीछे वाली कोनसी खाली आएगी, उसका भी यही हाल होगा , ऐसे इंतजार करता रहा तो जा लिया दफ्तर, बात पूरी होने तक शर्माजी बस पर लटक चुके थे एक पैर पर,

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