Sunday, February 15, 2009

यूँ भी होता है

गोद मैं बच्चा लिए व हाथ मैं झोला लटकाए एक ग्रामीण महिला बस मैं चडी, सीट खाली नही देख एक दम से वह निराश हो गयी, फिर भी जैसा कि बस मैं चड़ने वाला हर यात्री सोचता है कि शायद किसी सीट पर अटकने कीजगह मिल जाए, वह भी पीछे की और चली, तभी उसकी नजर एक सीट पर पड़ी , उस पर बस एक युवक बेठा था, आंखों मैं संतोष की चमक आ गयी, पास जाने पर जब उस पर कोई कपडा या कुछ सामान नही दिखायी दिया तो उसने धम्म से शरीर को छोड़ दिया सीट पर,
अरे रे कहाँ बेठ रही हो, यहाँ सवारी आएगी,
आंखों मैं उभरी चमक घुप्प से गायब हो गयी , आगे और सीट देखने की हिम्मत उसमें नही रही और वह वहीं सीटों के बीच गैलरी मैं ही बेठ गयी, इसके बाद उस खालीसीट को देख कर कईं आंखों मैं चमक आती रही और बुझती रही,
तभी एक युवती बस मैं चडी , अन्य लोगों को खड़ा देख उसने समझ लिया कि वह सीट खाली नही है, कोई आएगा, नीचे गया होगा, टिकेट या फिर कूछ लेने , और वह भी खड़ी हो गयी महिला के पास,
बेठ जाइये न, यहाँ कोई नही आएगा, इस आवाज पर युवती ने मुड़कर देखा तो युवक उससे ही मुखातिब था,
उसने आश्चर्य से पूछा कोई नही आएगा,
जी नही, युवक उसी मुस्कान के साथ बोला,
इस पर युवती मुडी और नीचे बेठी उस बच्चे वाली महिला को वहां बेठा दिया,
अब युवक का चेहरा देखने लायक था, वह युवती को खा जाने वाली नजरों से देख रहा था,
शिवराज गूजर

Thursday, February 12, 2009

अब तो शिकवा न करना मुझसे

पैदा होते ही
लग जाता है ठप्पा
जिस पर मनहूस का
भेदभाव बरता जाता है
जिसकी परवरिश मैं
हर पल
हर जरूरत के लिए
मारना पड़ता है मन को
बदन पर चुभती अनगिनत आँखें
भूखे गिद्ध की तरह
अपनों की परायों की
हर कदम पर बंदिशें
उम्र के फेलाव के साथ
बढता, बंदिशों का सिलसिला
इसी क्रम मैं
बाँध दिया जाता है
निरीह पशु की भांति
किसी अनजान दडबे के खूंटे से
कहते हुए की
अब यही तुम्हारी दुनिया है
निर्विरोध अंगीकार कर इस थोप को
डाल लेती है ख़ुद को
इस अनजान माहोल मैं
इस आशा के साथ
की शायद
इस हमसफ़र से ही मिल जाए
स्नेह थोड़ा
मगर
टूट जाता है, यह भरम भी
कुछ ही दिनों के चक्र मैं
जब पूरी नही होती मांगें उनकी
तो उडेल दी जाती है केरोसिन की पीपी
और दिखा दी जाती है दियासलाई
पल मैं जीती -जागती मूरत
बदल जाती है राख मैं
यह कहते, देख बापू
नही लगाया बट्टा तेरी शान को
तूने कहा था, वहाँ से तेरी अर्थी उठे
देख लो, उठ रही है
अब तो शिकवा न करना मुझसे
निभा दिया मैंने तेरा वचन
पैदा होने से लेकर मरने तक

शिवराज गूजर

Monday, February 9, 2009

गीत

गाँव से मेरा ख़त आया है
पढके यार सुनना तुम
कैसे है घरवाले मेरे
सबका हाल बताना तुम

माँ -बापूजी लिखते हैं
कैसे हो लाल हमारे तुम
दूर हो हमसे तो क्या बेटे
यादों मैं पास हमारे हो तुम

हम तो सब खुस हैं यहाँ पर
लिखना हाल तुम्हारा तुम
गाँव से .............

बहना लिखती है भइया मेरे
क्या तुम हमको भूल गए
घर, आँगन, गलियां, चौबारे
क्या तुम सबको भूल गए

शहर मैं जाकर भइया क्या
भूल गए हो प्यार हमारा तुम
गाँव से .................

भाई तुम्हारा छोटा लिखता है
भइया क्यों तड़पाते हो
याद तुम्हारी आती है
फिर क्यों नही तुम आते हो

अबके ख़त मैं लिखना भइया
कब आ रहे हो घर पर तुम
गाँव से ...............

शिवराज गूजर

Sunday, February 8, 2009

उम्मीद और सपने

दो चीजें
पीछा करती हैं हमेशा
इंसान का
उम्मीद और सपने
सपने होते हैं उसके अपने
उमीदें होती हैं उससे दूसरों को
दम तोड़ देते हैं सपने
हमेशा उमीदों के आगे
क्योंकि
वक़्त लगता है
सपनों के पूरे होने मैं
जबकि
उमीदें साथ होती हैं
हरपल
जो अहसास कराती हैं
उसे अपने होने का
किसी से बंधे होने का
पसोपेश मैं पड़ गया है मन
इस दोराहे पर आकर
एक तरफ़ मेरे सपने हैं
दूसरी और हैं उनकी उमीदें
सोचता हूँ
सपने तो मेरे अकेले के हैं
उमीदें मुझसे कितनो को हैं
माँ -बापू को
क्योंकि बेटा हूँ उनका
पाला - पोसा है मुझे
यह सोच कर
सहारा बनूँगा बुडापे मैं
उमीदें हैं, बीवी - बचों को
क्योंकि
पालनहार हूँ मैं उनका
तो फिर क्या अहमियत है
मेरे सपनों की
उनकी उमीदों के आगे
पर
मुझे भी तो वक़्त चाहिए
उनकी उमीदों पर खरा उतरने के लिए
क्या मैं कर सकता हूँ उनसे
कुछ और समय की
उम्मीद
शिवराज गूजर




Saturday, February 7, 2009

चार लाइने

बेखयाली में ही सही
आप कुछ कदम तो चले
शायद अपने बीच के
फासले यू ही मिट जायें

शिवराज गूजर

Thursday, February 5, 2009

दुनियादारी

ना थारी छे, ना म्हारी छे
या दुनिया भाया दारी छे
गरज पड्यां सूं गुड बण ज्या
काम निकलता ही खारी छे
या दुनिया......

आंटी मैं पीसा हो तो
जग बण जावे भाएलो
लक्ष्मीजी जद घर छोड़े
कुण नाती, कुणकी यारी छे
या दुनिया......

पूत कमाऊ हो घर मैं तो
सबने लगे प्यारो सो
बेरुजगार घूमतो बेटो
लागे सबने बेरी छे
या दुनिया......

शिवराज गूजर

Tuesday, February 3, 2009

वाह प्रीतो

अभिनेत्री प्रीटी जिंटा ने अपने जन्मदिन पर ऋषिकेश के मदर मिरेकल सकूल की ३४ लडकियॊं कॊ गॊद लिया है उनका यह कदम इसलिए भी महत्वपूरण हॊ गया है कि ये सभी लडिकयां अनाथ हैं समाज के लिए किया गया उनका यह यॊगदान अनुकरणीय है उम्मीद की जानी चाहिए कि दूसरे अभिनेता व अभिनेत्रियाँ भी जन्मदिनकी पार्टियों में अनाप-शनाप खर्च करने के बजाय इस तरह के सामाजिक यॊगदान का हिससा बनेंगे प्रीटी जिंटा इससे पहले भी मुंबई बम ब्लास्ट वाले मामले में निडर हॊकर गवाही देकर समाज के प्रति अपने संवेदनशील हॊने का परिचय दे चुकी हैं

Sunday, January 25, 2009

सलाम गणतंत्र

गणतंत्र दिवस की सबको शुभकामनायें,
गर्व करें की हम भारतीय हैं , और संकल्प लें की हम अपने देश के कानून की इज्जत करेंगे और इसकी गरिमा बनाये रखेंगे,

Saturday, January 3, 2009

रिश्ते की आड़

मंगेतर कह कर मीना ने
जिससे मिलवाया था
पिछली राखी पर वह
उससे राखी बंधवाने आया था,
समझदानी मैं बात घुसती नही देख
मैंने पूछा,
ये कैसी सगाई है
इस साल का मंगेतर
पिछले साल का भाई है,
वो बोली
तू भी ना शिवराज
कुछ नही समझता
वो तो एक दिखावा था
ताकि उस रिश्ते की आड़ मैं
यह रिश्ता पलता रहे
लोगों की नजरों से बचा रहे
शिवराज गूजर

Thursday, January 1, 2009

लोकल भाषा भी जानें

शहर मैं आने के बाद गाँव वाले भी शहर के रंग मैं रंग जाते हैं, यहाँ तक की उनका बोलना -चलना और रहन -सहन का डंग भी पूरी तरह बदल जाता है, ऐसे मैं उनके सहर वाले घर शिवराज पैदा होने वाला बच्चाभी पूरी तरह शहरी ही होता है, जब वे गाँव जाते हैं तो अजीब -अजीब सवाल करते हैं, मेरे एक परिचित के बच्चे ने तो बावडी को देख कर बड़ा विचित्र सा सवाल किया, अंकल ये अंडरग्राउंड मकान किसका है, यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी, मुझ पर ध्यान दिए बगेर वो बोला बरसात के दिनों मैं तो इसमें पानी भर जाता होगा, फिर ये लोग कहाँ जाते होंगे, जब मैंने उसे बताया की यह बनाई ही पानी के लिए ही गयी है, इसमें कोई नही रहता, इसे बावडी कहते हैं, वो बड़ा खुश हुआ और कहने लगा मैं अपने दोस्तों को बताऊँगा की मैंने सच की बावडी देखि है,
एक और अजीब किस्सा सुनिए, मैं बस से अजमेर जा रहा था, चालक के केबिन के पीछे वाली सीट पर जगह थी सो मैं वहीं
बेठ गया, रस्ते मैं दो लड़कियों को लघुशंका की शिकायत हुयी तो वे चालक की केबिन के पास आकर खड़ी हो गयीं. उन्होंने चालक से कहा की अंकल हमें टॉयलेट करनी है. चालक बेचारा ज्यादा पड़ा लिखा नही था, उसे कुछ समझ नही आया. सो वो बस मुस्करा कर रह गया, थोडी देर बाद उन्होंने फ़िर कहा अंकल बाथरूम करना है, चालक फ़िर मुस्करा कर रह गया, और बस अपनी रफ़्तार से रास्ता नापती रही, उनकी परेशानी बाद रही थी, यह देख मैंने चालक से कहा, की भाई साहब आपको सुने नही देता क्या ये बच्चियां कितनी देर से लघुशंका के लिए कह रही हैं, उसने साथ के साथ ब्रेक लगा दिए, फ़िर मुदा और हाथ जोड़ते हुए बोला, देविओं मैं कोने जानू अंग्रेजी, मैं समझया कोने की तुम काई खे रही छो, पिशाब के लिए खे देती तो इतरी परेशां तो कोणी होती, वो लड़किया शर्मिंदा सी होती हुयी नीचे उतर गयी लघुशंका के लिए,



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