लिखाड़ बस्ती के दोस्तों दीपोस्त्सव पर आप जो मांगें भगवान उससे दूना -तिगुना दे, आपकी हर मनोकामना पूरी हो , आपकी कलम हमेशा चलती रहे, इसी दुआ के साथ एक बार और दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनायें, बधाइयाँ,
शिवराज गूजर
Sunday, October 26, 2008
Friday, October 24, 2008
मैं घर पर नही हूँ
राजू , अरे सुन तो बेटा,
मिसेज शर्मा की बात पूरी होने तक तो राजू जा चुका था दरवाजे से बाहर,
ये राजू भी न, जानकी देवी के बुलावे के बाद तो किसी की नही सुनता, मैं जब काम बताती हूँ तो ममा ये कर रहा हूँ , ममा वो कर रहा हूँ, लाख बहने हैं इसके पास,
बुदबुदाती हुई मिसेज शर्मा अपने काम मैं लग गयी,
उधर राजू जब जानकी देवी के पास पहुँचा तो वह खाना पकाने की तयारी मैं थी, राजू को देखते ही बोली,
सुबह तू कहाँ चला गया था,
वो मोसी के यहाँ चला गया था, क्यों कोई काम था,
हाँ वो सब्जी लानी थी, सुबह भी दाल ही बनाई,
अभी ले आऊंगा आंटी,
राजू का ध्यान जानकी देवी की बातों मैं कम और इधर उधर देखने मैं जयादा था, ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी को दूंद रहा हो, अंत मैं उससे रहा नही गया और उसने पूछ ही लिया,
आंटी , सीमा दिखाई नही दे रही आज,
अरे हाँ मैं तुम्हें बताने ही जा रही थी, वो सुबह पापा आए थे, उसे भी साथ ले गए, कह गए थे अबउसके गाँव की स्कूल मैं ही भरती कराएँगे,
ओह, अब कब आएगी,
आने का तो कुछ नही कह सकती बेटा, वो तो मेरे कहने से दामाद जी ने कुछ दिन के लिए मेरे पास छोड़ दिया था,
यह सुनते ही राजू बिना कुछ बोले चल दिया, बाहर की औरयह देख जानकी देवी ने उसे आवाज दी,
अरे बेटा, सब्जी तो ले आ,
बाद मैं देखूँगा आंटी, कल टेस्ट है पदाई करनी है।
राजू बुदबुदाता हुआ घर मैं घुसा तो मिसेज शर्मा ने पूछ लिया,
क्या हुआ बेटा, किस पर नाराज हो रहे हो,
कुछ नही ममा, लोग सबको अपनी तरह फालतू समझते हैं, जब देखो, बेटा ये ले आओ, बेटा वो ले आओ, आगे से जानकी आंटी कभी आवाज लगाये तो कह देना मैं घर पर नही हूँ,
शिवराज गूजर
मिसेज शर्मा की बात पूरी होने तक तो राजू जा चुका था दरवाजे से बाहर,
ये राजू भी न, जानकी देवी के बुलावे के बाद तो किसी की नही सुनता, मैं जब काम बताती हूँ तो ममा ये कर रहा हूँ , ममा वो कर रहा हूँ, लाख बहने हैं इसके पास,
बुदबुदाती हुई मिसेज शर्मा अपने काम मैं लग गयी,
उधर राजू जब जानकी देवी के पास पहुँचा तो वह खाना पकाने की तयारी मैं थी, राजू को देखते ही बोली,
सुबह तू कहाँ चला गया था,
वो मोसी के यहाँ चला गया था, क्यों कोई काम था,
हाँ वो सब्जी लानी थी, सुबह भी दाल ही बनाई,
अभी ले आऊंगा आंटी,
राजू का ध्यान जानकी देवी की बातों मैं कम और इधर उधर देखने मैं जयादा था, ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी को दूंद रहा हो, अंत मैं उससे रहा नही गया और उसने पूछ ही लिया,
आंटी , सीमा दिखाई नही दे रही आज,
अरे हाँ मैं तुम्हें बताने ही जा रही थी, वो सुबह पापा आए थे, उसे भी साथ ले गए, कह गए थे अबउसके गाँव की स्कूल मैं ही भरती कराएँगे,
ओह, अब कब आएगी,
आने का तो कुछ नही कह सकती बेटा, वो तो मेरे कहने से दामाद जी ने कुछ दिन के लिए मेरे पास छोड़ दिया था,
यह सुनते ही राजू बिना कुछ बोले चल दिया, बाहर की औरयह देख जानकी देवी ने उसे आवाज दी,
अरे बेटा, सब्जी तो ले आ,
बाद मैं देखूँगा आंटी, कल टेस्ट है पदाई करनी है।
राजू बुदबुदाता हुआ घर मैं घुसा तो मिसेज शर्मा ने पूछ लिया,
क्या हुआ बेटा, किस पर नाराज हो रहे हो,
कुछ नही ममा, लोग सबको अपनी तरह फालतू समझते हैं, जब देखो, बेटा ये ले आओ, बेटा वो ले आओ, आगे से जानकी आंटी कभी आवाज लगाये तो कह देना मैं घर पर नही हूँ,
शिवराज गूजर
Thursday, October 23, 2008
नेता
वोट देकर हाथ अभी डीला भी नही पड़ा है
झोली फैलाये वो फिर मेरे दर पर खड़ा है
जाति के नाम मजहब के नाम दे दे बाबा
अदद वोट की रट पकडे मेरे पीछे पड़ा है
पिछली बार माँगा था जिसकी बुराई करके
उसी दल का पट्टा अब गले मैं बांधे खड़ा है
पिछले वादों का तो हिसाब अभी किया नही
नए वादों का और वो पुलंदा लिए खड़ा है
सड़क, नल, बिजली, नौकरी जो चाहे मांगले
फकीर दर पर देखो खुदा बन कर खड़ा है
(रचना पुरानी है लेकिन राजस्थान मैं दिसम्बर मैं विधानसभा चुनाव होने के कारन वर्तमान मैं प्रासंगिक है )
शिवराज गूजर
झोली फैलाये वो फिर मेरे दर पर खड़ा है
जाति के नाम मजहब के नाम दे दे बाबा
अदद वोट की रट पकडे मेरे पीछे पड़ा है
पिछली बार माँगा था जिसकी बुराई करके
उसी दल का पट्टा अब गले मैं बांधे खड़ा है
पिछले वादों का तो हिसाब अभी किया नही
नए वादों का और वो पुलंदा लिए खड़ा है
सड़क, नल, बिजली, नौकरी जो चाहे मांगले
फकीर दर पर देखो खुदा बन कर खड़ा है
(रचना पुरानी है लेकिन राजस्थान मैं दिसम्बर मैं विधानसभा चुनाव होने के कारन वर्तमान मैं प्रासंगिक है )
शिवराज गूजर
Wednesday, October 15, 2008
मेरे सामने शरमा रही है
योन शिक्षा पर लिखी गयी पुस्तक के लेखक का टीवी के लिए इंटरव्यू चल रहा था, उन्होंने पुस्तक मैं पुरजोर तरीके से यह बात उठाई थी कि बच्चों को योन शिक्षा डायनिंग टेबल पर दी जानी चाहिए , अपने लेखन मैं उन्होंने अपनी धर्मपत्नी का बराबर का हाथ बताया था, जाहिर था उनके साथ उनकी अर्धांगिनी का भी इंटरव्यू जरूरी था, लेकिन वो बोलने मैं बार-बारअटक रही थी, हमने समझा वो कैमरे के सामने ख़ुद को असहज महसूस कर रही है सो उन्हें खोलने के लिए कहा, आप बोलिए मैडम, यह तो रिहर्सलहै फाइनल टेक बाद मैं लेंगे, तभी लेखक महोदय बीच मैं ही बोल पड़े, नही ऐसी कोई बात नही है, योन संबंधों की बात है न, इसलिए ये मेरे सामने झिजक रही है, यह कह कर वे भीतर चले गए, अब इंटरव्यू निर्बाध चल रहा था,
शिवराज गूजर
शिवराज गूजर
Wednesday, October 1, 2008
एक अलग से नौकर रख लो
सुबह -सुबह मोनू उठकर
माँ से बोला आँखें भरकर
मम्मी पड़ने मैं नही जाना
मुस्किल चलना बैग उठाकर
मैं नन्हा सा बालक मम्मी
थेला है भारी भरकम
इस्कूल तक जाते -जाते
भर जाता है मेरा दम
या तो किताबें कम कर लो
या एक अलग से नौकर रख लो
बहुत वजन है मम्मी इसमे
चाहो तो तुम परख लो
भर आया दिल ममता का
सुनकर बोल दुलारे के
ना बेटा ना, नही रोते हैं
हैं नियम पड़ाई के न्यारे से
पड़ते -पड़ते जब लाला तू
ऊंची कक्षा मैं जाएगा
बेग -बाग़ कुछ न रखेगा
बस एक कापी ले जाएगा
बात सुनी जो मम्मी की
मोनू बड़ा हर्षाया
पलटा जाने को इस्कूल
हंसकर बेग उठाया
शिवराज गूजर
माँ से बोला आँखें भरकर
मम्मी पड़ने मैं नही जाना
मुस्किल चलना बैग उठाकर
मैं नन्हा सा बालक मम्मी
थेला है भारी भरकम
इस्कूल तक जाते -जाते
भर जाता है मेरा दम
या तो किताबें कम कर लो
या एक अलग से नौकर रख लो
बहुत वजन है मम्मी इसमे
चाहो तो तुम परख लो
भर आया दिल ममता का
सुनकर बोल दुलारे के
ना बेटा ना, नही रोते हैं
हैं नियम पड़ाई के न्यारे से
पड़ते -पड़ते जब लाला तू
ऊंची कक्षा मैं जाएगा
बेग -बाग़ कुछ न रखेगा
बस एक कापी ले जाएगा
बात सुनी जो मम्मी की
मोनू बड़ा हर्षाया
पलटा जाने को इस्कूल
हंसकर बेग उठाया
शिवराज गूजर
Sunday, September 21, 2008
विडम्बना
चांदपोल चलोगे,
इस शब्द ने जैसे कालू के कानो मैं सहद घोल दिया, वह अभी घर से रिक्शा लेकर बड़ी चोपड पहुँचा ही था, ऐसा कभी - कभार ही होता थाकि पहुँचते ही सवारी मिल जाए, कई बार तो घंटों इन्तेजार करना पड़ जाता था,
हाँ क्यों नही, बेठो, वो चहकते हुए बोला
कितना लोगे
पाँच रुपये
चांदपोल के पाँच रुपये
ज्यादा नही मांग रहा हूँ बाबूजी, बोहनी का वक्त है इसलिए पाँच ही मांग रहा हूँ, वरना तो छः रुपये से कम नही लेता,
रहने दे, सिखा मत, चार रूपये लेना है तो बोल, वरना अभी बस आने ही वाली है,
बस का नाम सुनते ही कालू कुछ दीला पड़ गया, फिर बोहनी करनी थी सो वह चार रुपये मैं सवारी को ले जाने के लिए तैयार हो गया,
सवारी के बैठते ही कालू ने चला दिए पेडल पर पैर ,
चांदपोल पहुंचकर सवारी जब उसे पाँच रुपये का नोट देने लगी तो उसने खुले नही होने की समस्या बताई
सवारी ने बुरा सा मुह बनाया, खुले नही है, मैं सब समझता हूँ, लेकिन मैं भी कम नही हूँ,
कहते हुए सवारी पास ही पान वाले कि दुकान पर चली गयी,
पान वाले ने कुछ लिए बगेर खुले देने से मन कर दिया, इस पर सवारी ने कहा, मैं कुछ खाता तो हूँ नही एक रुपये कुछ भी दे दे यार, वो रिक्शे वाले को किराया देना है,
पान वाले ने उसे एक गुटखा देते हुए खुले रुपये पकड़ा दिए,
सवारी ने गुटखा फाड़ कर मसाला मुह मैं डाला कालू को चार रुपये पकडाये और चल दी अपनी राह
कालू को ख़ुद पर ही हँसी आ गयी, एक रूपया जो उसका जायज हक़ थासवारी उसे देने के बजाय उससे एक ग़लत आदत की शुरुआत कर गयी,
उसने आसमान की और देखाऔर चला दिए पेडल पर पैर
शिवराज गूजर
इस शब्द ने जैसे कालू के कानो मैं सहद घोल दिया, वह अभी घर से रिक्शा लेकर बड़ी चोपड पहुँचा ही था, ऐसा कभी - कभार ही होता थाकि पहुँचते ही सवारी मिल जाए, कई बार तो घंटों इन्तेजार करना पड़ जाता था,
हाँ क्यों नही, बेठो, वो चहकते हुए बोला
कितना लोगे
पाँच रुपये
चांदपोल के पाँच रुपये
ज्यादा नही मांग रहा हूँ बाबूजी, बोहनी का वक्त है इसलिए पाँच ही मांग रहा हूँ, वरना तो छः रुपये से कम नही लेता,
रहने दे, सिखा मत, चार रूपये लेना है तो बोल, वरना अभी बस आने ही वाली है,
बस का नाम सुनते ही कालू कुछ दीला पड़ गया, फिर बोहनी करनी थी सो वह चार रुपये मैं सवारी को ले जाने के लिए तैयार हो गया,
सवारी के बैठते ही कालू ने चला दिए पेडल पर पैर ,
चांदपोल पहुंचकर सवारी जब उसे पाँच रुपये का नोट देने लगी तो उसने खुले नही होने की समस्या बताई
सवारी ने बुरा सा मुह बनाया, खुले नही है, मैं सब समझता हूँ, लेकिन मैं भी कम नही हूँ,
कहते हुए सवारी पास ही पान वाले कि दुकान पर चली गयी,
पान वाले ने कुछ लिए बगेर खुले देने से मन कर दिया, इस पर सवारी ने कहा, मैं कुछ खाता तो हूँ नही एक रुपये कुछ भी दे दे यार, वो रिक्शे वाले को किराया देना है,
पान वाले ने उसे एक गुटखा देते हुए खुले रुपये पकड़ा दिए,
सवारी ने गुटखा फाड़ कर मसाला मुह मैं डाला कालू को चार रुपये पकडाये और चल दी अपनी राह
कालू को ख़ुद पर ही हँसी आ गयी, एक रूपया जो उसका जायज हक़ थासवारी उसे देने के बजाय उससे एक ग़लत आदत की शुरुआत कर गयी,
उसने आसमान की और देखाऔर चला दिए पेडल पर पैर
शिवराज गूजर
Friday, September 19, 2008
व्यंगिका
जातिवाद मिटाने का
अभी-अभी वादा करके
सभा से लोटे नेताजी
कार्यकर्ताओं से बोले
पता करो, उस एरिये मैं
किस जाती का बोलबाला है
उसी हिसाब से रणनीति बनायें
चुनाव का वक्त आने वाला है
शिवराज गूजर
अभी-अभी वादा करके
सभा से लोटे नेताजी
कार्यकर्ताओं से बोले
पता करो, उस एरिये मैं
किस जाती का बोलबाला है
उसी हिसाब से रणनीति बनायें
चुनाव का वक्त आने वाला है
शिवराज गूजर
Thursday, September 18, 2008
नेता
वोट देकर हाथ अभी डीला भी नही पड़ा है
झोली फैलाये वो फिर मेरे दर पर खड़ा है
जाति के नाम मजहब के नाम दे दे बाबा
अदद वोट की रट पकडे मेरे पीछे पड़ा है
पिछली बार माँगा था जिसकी बुराई करके
उसी दल का पट्टा अब गले मैं बांधे खड़ा है
पिछले वादों का तो हिसाब अभी किया नही
नए वादों का और वो पुलंदा लिए खड़ा है
सड़क, नल, बिजली, नौकरी जो चाहे मांगले
फकीर दर पर देख खुदा बन कर खड़ा है
झोली फैलाये वो फिर मेरे दर पर खड़ा है
जाति के नाम मजहब के नाम दे दे बाबा
अदद वोट की रट पकडे मेरे पीछे पड़ा है
पिछली बार माँगा था जिसकी बुराई करके
उसी दल का पट्टा अब गले मैं बांधे खड़ा है
पिछले वादों का तो हिसाब अभी किया नही
नए वादों का और वो पुलंदा लिए खड़ा है
सड़क, नल, बिजली, नौकरी जो चाहे मांगले
फकीर दर पर देख खुदा बन कर खड़ा है
Sunday, September 14, 2008
हमने तो पहले ही चेता दिया था
बचपन मैं सुना करते थे किडाकू किसी को भी लूटने से पहले इश्तेहार चिपका दिया करते थे, जिसमें लूट का दिन, किसके यहाँ लूट करेंगे और कब करेंगे यह सब लिखा रहता था, तय दिन को पूरी सुरक्षा व्यस्था को धता बताते हुए डाकू वारदात को अंजाम दे जाते थे और पुलिस हाथ मलती रह जाती थी, ऐसी कई फिल्में भी बनी थी जिनमें ये सब दिखाया गया था,
तब ये सब सुनते थे, आज देख रहे हैं, बदला है तो बस ये कि अब डाकू कि जगह आतंकवादी ने ले ली है और इश्तेहार की जगह मेल ने, उनके हलकारे कि जगह मीडिया ने ले ली है, जो उनके मेल को लेकर डिन्डोरा पीटता रहता है, जैसे ही आतंकवादी कहीं कोई वारदात करते हैं, सुरक्षा एजेंसियों का वही सदा गला बयान आ जाता है हमने तो पहले ही चेता दिया था, लगता है चेताने के आलावा इनका कोई काम ही नही रह गया है,
तब ये सब सुनते थे, आज देख रहे हैं, बदला है तो बस ये कि अब डाकू कि जगह आतंकवादी ने ले ली है और इश्तेहार की जगह मेल ने, उनके हलकारे कि जगह मीडिया ने ले ली है, जो उनके मेल को लेकर डिन्डोरा पीटता रहता है, जैसे ही आतंकवादी कहीं कोई वारदात करते हैं, सुरक्षा एजेंसियों का वही सदा गला बयान आ जाता है हमने तो पहले ही चेता दिया था, लगता है चेताने के आलावा इनका कोई काम ही नही रह गया है,
Sunday, September 7, 2008
जमाना
बहुत दिलफरेब यह जमाना है बाबू
अंदर कुछ, बाहर कुछ फसाना है बाबू
भाई-बहन जैसा पाक रिश्ता भी आजकल
अवैध सम्बन्ध छुपाने का बहाना है बाबू
घर-बाहर घूरती है जिस्म को भूखी आँखें
मुस्किल ऐसे मैं अस्मत बचाना है बाबू
खाओ रहम किसी पे वाही रेत देता है गला
इनायत अब आफत गले लगाना है बाबू
सेवा नही रह गयी देश की अब नेतागीरी
ये व्यापार है, जिससे घर सजाना है बाबू
घर मैं हो बेटा, उस पर हो नौकरीपेशा
बेटा नहीं, वह कुबेर का खजाना है बाबू
शिवराज गूजर
अंदर कुछ, बाहर कुछ फसाना है बाबू
भाई-बहन जैसा पाक रिश्ता भी आजकल
अवैध सम्बन्ध छुपाने का बहाना है बाबू
घर-बाहर घूरती है जिस्म को भूखी आँखें
मुस्किल ऐसे मैं अस्मत बचाना है बाबू
खाओ रहम किसी पे वाही रेत देता है गला
इनायत अब आफत गले लगाना है बाबू
सेवा नही रह गयी देश की अब नेतागीरी
ये व्यापार है, जिससे घर सजाना है बाबू
घर मैं हो बेटा, उस पर हो नौकरीपेशा
बेटा नहीं, वह कुबेर का खजाना है बाबू
शिवराज गूजर
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