Wednesday, December 17, 2008

नास्तिक

मैं बस में बेठा बाहर हो रही बरसात का मजा ले रहा था

कोई आएगा इस पर

अजनबी आवाज सुनकर मैं मुडा, आवाज के मालिक पर नजर गई, उम्र यही कोई २५ -३० साल, आंखों पर नजर का चस्मा चड़ाये, महाशय सवालिया नजरों से मुझे देख रहे थे,

फिलहाल तो नही

मैंने उसका मुआयना करते हुए कहा,

आप कहाँ तक जायेंगे ?

उसने धम्म से बैठते हुए दूसरा सवाल दाग दिया,

टोडारायसिंह, और आप,

बात बढाने की गरज से मैंने पूछा

भांसू

उसकी बात ख़त्म होने के साथ ही बस झटके से आगे बाद गई, बस चलने के साथ ही बातों का सिलसिला चल निकला, बात चलते-चलते आ पहुंची दुनिया के सृजक पर , उसके अस्तित्व के होने न होने पर, इस बात को लेकर हम दोनों मैं बहस छिड़ गई, वह उसके अस्तित्व को पूरी तरह नकार रहा था, और मैं इस बात पर अदा था की वो इस दुनिया मैं है चाहे किसी भी रूप मैं हो। मेरे अपने तर्क थे तो उसकी अपनी काटें, इससेपहले की हमारी बहस उग्र होती ब्रेकों की चरमराहट के साथ ही बस रुक गयी, पता चला की नदी मैं पानी ज्यादा आ गया है, जो पुल पर से बह रहा है, ऐसे मैं बस पुल पर से नही गुजर सकती, पानी उतरने मैं देर लगनी थी सो हम भी उतर आए नीचे, नदी के दोनों और वाहनों की लाइन लगी थी, इधर वाले इस किनारे खड़े थे तो उधर वाले उस किनारे, तभी एक ट्रक आया, उसमें से चालक और खलाशी उतरे पानी का अंदाजा लगाया और ट्रक घुसा ले गए पानी मैं, देखते ही देखते ट्रक नदी के पार निकल गया,

यह देख हमारी बस के चालक को भी जोश आ गया और उसने भी घुसा दी बस पानी मैं, नदी के बीच मैं पहुँचते ही बस ने अचानक धक्का सा खाया, इसी के साथ पूरी बस श्रीजी के जयकारों से गूँज उठी,

सबसे पहले जय बोलने वाला मेरी बगल मैं बैठा वाही शख्स था जो पूरे रस्ते ऊपरवाले के अस्तित्व को नकार रहा था,

शिवराज गूजर



2 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह क्या घटना का जिक्र किया है । वैसे ये वो लोग है जो अपनी जरुरत के अनुसार अपने तर्को का इस्तेमाल करते हैं। कुछ चीजॆं तर्क से बहार भी होती है जिन्हें समझाया नही जा सकता।

श्रुति अग्रवाल said...

बिलकुल सही....मीडिया में आपको कई नास्तिक दिखेगे। अपने आस-पास ही देखिएगा। दिखाएँगे कि वामपंथी हैं, नास्तिक हैं लेकिन जैसे ही आप उनके हाथों पर नजर डालेंगे कई नगीने दिखाई देंगे। कुछ पूछेंगे तो खिसियाएँ हुए जवाब देंगे कि माँ की जिद्द पर पहन ली। दरअसल यह आदत है हम जैसे हैं वैसे दिखाई नहीं देना चाहते...सब लबादा ओढ़ों हैं। कोन समझाए ऐसे लोगों को कि अंधविश्वास और विश्वास में अतंर होता है। जब हम जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी लोग जब इस अंतर को समझ जाएँगें तब ही लबादे से मुक्ति मिलेगी।

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