Wednesday, January 13, 2010

वो काटा के शोर में स्मृतियों की पतंग

आज बहुत ठंड थी। धूप खाने छत पर चला आया। दोनों बेटे और बेटी पतंग उड़ाने में मस्त थे। मैं पहुंचा तो हल्की सी मुस्कराहट के साथ देखा और फिर से नजरें टिका दीं आसमान पर। अभी ठीक से बैठा भी नहीं था कि वो काटा के शोर ने बरबस ही ध्यान खींच लिया। किसी की पतंग कट गई थी शायद। हवा में लहरा कर जा रही पतंग के साथ ही जाने कब बचपन के दिन छम से स्मृतियों में उतर आए। गांव उतर आया आंखों में। रामनाराण्यां, सांवळ्या और मैं आ गए थे गरियाले (मोहल्ले का चौक ) में। खाज्या खेलने। उन दिनों सकरांत पर पतंग नहीं उड़ाते थे। दड़ी (गेंद) और खाज्या ही खेले जाते थे। पतंग दुर्गा दाजी की दुकान में मिलते नहीं थे। गांव में अकेली उनकी दुकान थी। ऐसे में स्कूल की कॉपी के बीच वाले पन्ने के दोनों सिरों पर धागा बांधकर पीछे कागज की पूंछ लगाकर हम ही पतंग बना लिया करते थे। उसकी खासियत यह हुआ करती थी कि वो इन पतंगों की तरह खड़े -खड़े नहीं उड़ाया जा सकता थ। उसे उड़ाने के लिए दौडऩा पड़ता था। इसलिए जिस दिन वो पतंग बना लेते थे उस दिन तो पूरे दिन गलियां ही नापते रहते थे। खैर हम खाज्या खेल रहे थे।
खाज्या से मतलब उस छोटे गढढे से है, जिसमें खेलने वाला लकड़ी टिकाए रहता है। एक जना डाम देता है। उसे गेंद (कपड़े से बनाई हुई) उठाकर खाज्या में लकड़ी टिकाए खड़े खिलाडिय़ों में से किसी को मारना होता है। जिसके गेंद लग जाए उसे डाम देना होता है। गेंद उठाकर फेंकना इतना आसान नहीं होता, क्योंकि सभी खिलाड़ी लकडिय़ों से गेंद पर मारने को तैयार रहते हैं। कई बार तो गेंद पकडऩे वाले के हाथों पर भी लग जाती थी। गेंछ को हिट मारने वाले खिलाड़ी को गेंद पर मारते ही दौड़कर अपना खाज्या बचाना होता था। अगर उससे पहले डाम देने वाला खाज्या पर पैर रख देता है तो वो खाज्या उसका हो जाता है और खिलाड़ी को उसे लकड़ी देते हुए खाज्या छोड़कर डाम देना पड़ा है। इस तरह खाज्या कब्जाने वाले को खाज्या का चोर कहते हैं। ऐसे खाज्या के चोर के वो डाम देने वाला गेंद मार सकता है। यदि मान लो किसी ने खिलाड़ी के गेंछ मारकर खाज्या प्राप्त करता है तो वह खाज्या का बाप कहलाता है। ऐसे में खाज्या का पूर्व मालिक डाम देते समय उसे गेंद नहीं मार सकता जब तक कि गेद के टोरा (हिट) नहीं लग जाए।
वो काटा के शोर के साथ ही स्मृतियों की पतंग कट गई थी। बचपन के दिन फुर्र हो गए थे वो काटा के शोर में। हो सकता है व्यस्तता के चलते मैं कल पतंग भी नहीं उड़ा पाऊं, लेकिन स्मृतियों में ही सही पुराने भायलों के साथ खाज्या खेलकर सकरांत मनाने में बहुत मजा आया।

4 comments:

Mithilesh dubey said...

बढिया संस्मरण रहा । आपको मकर संक्रान्ति की बहुत-बहुत बधाई ।

Udan Tashtari said...

स्मृतियाँ ऐसे ही सुखद अनुभूतियाँ दे जाती हैं.

लोहिड़ी पर्व और मकर संक्रांति की आप को हार्दिक शुभकामनाये.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी डायरी का ये पृष्ठ बहुत बढ़िया रहा!

रावेंद्रकुमार रवि said...

"वो काटा का शोर हर कहीं - मस्ती सब पर छाई है!"
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ओंठों पर मधु-मुस्कान खिलाती, कोहरे में भोर हुई!
नए वर्ष की नई सुबह में, महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ", मिलत, खिलत, लजियात ... ... .
संपादक : सरस पायस

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