Sunday, January 23, 2011

ऐसी भी क्या जल्दी है...

रेलवे फाटक बंद था। लोग अपने वाहन रोक कर खड़े थे, पर शायद उसे ज्यादा जल्दी थी। फाटक के बगल से उसने स्कूटी चढ़ा दी पटरी पर। अभी वह पटरी के बीचों-बीच थी कि ट्रेन आ गई। मौत उसकी आंखें के आगे नाचने लगी। इस वक्त जो उसने सबसे अच्छा काम किया वो यह था कि स्कूटी का मोह छोड़ पटरी के बाहर छलांग लगा दी। इधर वो गिरी और उधर स्कूटी पर से ट्रेन धड़ाधड़ करती निकल गई।
      यह एक अकली घटना नहीं है। यह तो बस ताजा उदाहरण है, ऐसे कितने ही प्रकरण रोज बासी हो जाते हैं। लोग खबर सुनते हैं, पढ़ते भी हैं और गुस्सा भी होते हैं पर क्षणिक। अगले चौराहे पर वही दुस्साहस खुद कर रहे होते हैं। पटरी के पास बसी कॉलोनियों-बस्तियों के लोग तो पटरी ऐसे पार करते हैं जैसे उनकी गली की सड़क हो। ट्रेन बिल्कुल करीब होती है और वे पटरी पर होते हैं। दो मिनट रुक कर ट्रेन को गुजर जाने देने से हालांकि उनका कोई बहुत बड़ा नुकसान मेरे हिसाब से नहीं होगा पर यह उनका रुटीन है।
     हाल कुछ ऐसे ही दिनभर लाल बत्ती पर भी नुमाया होते रहते हैं। स्टॉप लाइन तो बेचारी वाहन चालकों को बहुत पीछे से ताकती रहती है। बत्ती पीली नहीं होती उससे पहले तो सब ऐसे दौड़ पड़ते हैं जैसे कोई रेस चल रही हो। बत्ती कितने समय लाल रहेगी इसके लिए चौराहों पर टाइम मीटर लगाए हुए हैं। इनसे स्थिति ज्यादा बिगड़ रही है। लोगों का ध्यान बत्ती के बजाय इन पर होता है। जैसे ही मीटर 5-6 सैकंड पर पहुंचता है, लोगों की गाडिय़ां रफ्तार पकड़ चुकी होती हैं, जबकि दूसरी ओर से आने वाले अभी आधे चौराहे होते हैं।
       कई पैदल चलने वाले भी इनसे किसी मायने में कम नहीं है। जेब्रा क्रॉसिंग का तो उनके लिए कोई मतलब ही नहीं है। जिस जगह चल रहे होते हैं वहीं से घुमा देते हैं अपनी बॉडी। न आगे देखना न पीछे। बस भागकर पार कर जाना चाहते हैं सड़क। उनकी यही जल्दी दुर्घटना की सबसे प्रिय परिस्थिति है।
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि सबको यह जल्दी कहां जाने की है। अपने घर जाने की या भगवान के घर जाने की।

1 comment:

boletobindas said...

ये तो रोजमर्रा का हाल है। लोगो को जाने काहे कि जल्दी है।

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