Thursday, February 3, 2011

तुम क्यों हार गई कविता...

जिंदगी से अभी तुम्हारी जंग शुरू भी नहीं हुई थी। अभी तो तुम अपने मां-बाप के कंधों पर खेल रही थी। अच्छी पढ़ाई कर रही थी। आने वाले दिनों में तुम एक ऐसे सफर पर जाने वाली थी जहां तुम्हें लोगों की जिंदगी बचानी थी। तुम्हारे पेशे में तो लोगों को बहादुर बनाया जाता है, ताकि वे मरते हुए लोगों को बचा सकें। उन्हें आशावादी बनाया जाता है ताकि वे मरते हुए आदमी के मन में भी जिंदगी के प्रति ललक पैदा कर सकें। फिर आधे सफर तुम कायर कैसे हो गई। एक चुन्नी का फंदा क्यों तुम्हें मुक्ति दाता लगा। अगर कहीं कोई टीस थी मन में तो तुम लड़ी क्यों नहीं। अपने भीतर की पूरी ताकत बटोरकर पछाड़ देना था उसे। बताओ न तुम लड़ी क्यों नहीं। तुम क्यों हार गई कविता...।
(नर्सिंग छात्रा के आत्महत्या करने की खबर पढ़ी तो मन में यही सवाल उभरा)

11 comments:

Sunil Kumar said...

तुम क्यों हार गई कविता.sahi saval magar uttar sunne ki hammat bhi chahiye

निर्मला कपिला said...

केवल सवाल करकी ही हम अपने फर्ज़ को पूरा कर लेते हैं लेकिन किसी और कविता को बचाने के लिये प्रयास क्यों नही करते। शायद सब हार चुके हैं। शुभकामनायें।

शारदा अरोरा said...

एक नजर शीर्षक से ये लगा कि कवि की कविता ने दम तोड़ दिया ...बड़ा दुखदाई है ये ईश्वर की कृति ने अपना दम भुला के जमाने से घबरा के दम तोड़ दिया ...

शिवराज गूजर said...

thanks sunilji, nirmalaji or sharda ji. sawal to javab mangate hi hain. koshish honi chahiye ki phir koi phansi ke fande main mukti ka marg na talashe.

Dr. Manish said...

As per my thinking, suicide requires a quite strong heart. There must be even stronger conditions propelling to this. It is a subject of open minded and vast research.

Dr. Manish said...

As per my thinking, suicide requires a quite strong heart. There must be even stronger conditions propelling to this. It is a subject of open minded and vast research. We can just assume the conditions before and after this.

शिवराज गूजर said...

मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं कि आत्महत्या के लिए काफी मजबूत दिल चाहिए। मेरे हिसाब से आत्महत्या करने वाले कायर होते हैं जो जिंदगी की समस्याओं से डरकर मैदान छोड़ जाते हैं। आप बताएं क्या उनकी इस हिम्मत (जैसा कि आप मानते हैं) से किसी का कोई भला होता है? उनका, उनके परिवार का या फिर किसी और का।

संजय @ मो सम कौन ? said...

आज पहली बार आया हूं आपके ब्लॉग पर, बहुत अच्छा लगा।
आपके इस पोस्ट पर लास्ट कमेंट से अक्षरश्ळ सहमत।

शिवराज गूजर said...

thanks sanjayji.umeed hai aap ab regular mere blog par aayenge.

Babulal Sharma said...

kya likhte ho, man gaye bhai.dard ka sabdon se ahsas kara diya.

शिवराज गूजर said...

thanks babu bhai.

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