Thursday, February 12, 2009

अब तो शिकवा न करना मुझसे

पैदा होते ही
लग जाता है ठप्पा
जिस पर मनहूस का
भेदभाव बरता जाता है
जिसकी परवरिश मैं
हर पल
हर जरूरत के लिए
मारना पड़ता है मन को
बदन पर चुभती अनगिनत आँखें
भूखे गिद्ध की तरह
अपनों की परायों की
हर कदम पर बंदिशें
उम्र के फेलाव के साथ
बढता, बंदिशों का सिलसिला
इसी क्रम मैं
बाँध दिया जाता है
निरीह पशु की भांति
किसी अनजान दडबे के खूंटे से
कहते हुए की
अब यही तुम्हारी दुनिया है
निर्विरोध अंगीकार कर इस थोप को
डाल लेती है ख़ुद को
इस अनजान माहोल मैं
इस आशा के साथ
की शायद
इस हमसफ़र से ही मिल जाए
स्नेह थोड़ा
मगर
टूट जाता है, यह भरम भी
कुछ ही दिनों के चक्र मैं
जब पूरी नही होती मांगें उनकी
तो उडेल दी जाती है केरोसिन की पीपी
और दिखा दी जाती है दियासलाई
पल मैं जीती -जागती मूरत
बदल जाती है राख मैं
यह कहते, देख बापू
नही लगाया बट्टा तेरी शान को
तूने कहा था, वहाँ से तेरी अर्थी उठे
देख लो, उठ रही है
अब तो शिकवा न करना मुझसे
निभा दिया मैंने तेरा वचन
पैदा होने से लेकर मरने तक

शिवराज गूजर

6 comments:

अनिल कान्त : said...

ultimate ...superb .....

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

यह कितनी दुखद बात है कि अभी भी हमें कहना ही पडेगा कि यह सच है. यह हमारे समाज की विकृत मानसिकता का ही तो नतीजा है!

संगीता पुरी said...

बहुत दर्दभरा.....पर बहुत अच्‍छा !!!

vandana said...

aapne to haqeeqat ka aisa khaka banaya hai ki laga ki sab aankhon ke samne ho raha hai..........dil toot gaya hai aaj............kabhi kabhi haqeeqat aisi hi hoti hai..........bhayavah.
isse aage kuch nhi kah sakungi.

neelima sukhija arora said...

आपकी रचनाओं में वाकई कोई बात है

सीमा रानी said...

शिवराज जी आपने कहा था सो आपका ब्लॉग देखा अच्छा लगा आशा है और भी इसी तरह की सुंदर रचनाएँ आगे डायरी में मिलेंगी .

468x60 Ads

728x15 Ads