जयपुर. देश के ख्यातनाम कवि भवानी प्रसाद मिश्र की जयंती रविवार को झालाना संस्थानिक क्षेत्र स्थित प्रोढ शिक्षा समिति के सभागार में मनाई गई। इस मोके पर पदमश्री पंडित विश्व मोहन भट्ट एवं कवि नंदकिशोर आचार्य ने मिश्र की रचनाओँ की सीडी का लोकार्पण किया. मिश्र की रचनाओं को संगीत उनके बेटे अमिताभ मिश्र ने दिया है. कार्यक्रम के दौरान यह सीडी चलाकर उसका रसास्वादन सभागार में मौजूद संगीत रसिकों को कराया गया.
रचना सुनी, धुन बनाईं और गवा भी दिया
पदमश्री पंडित विश्व मोहन भट्ट ने मिश्र की रचना ' चलो गीत गाओ' को सीडी पर सुना तो उन्हें यह रचना इतनी पसंद आई कि उन्होंने उसी समय अपनी तरफ से इसको संगीतबद्ध किया। यही नहीं सभागार में मौजूद जानी- मानी शास्त्रीय गायिका प्रो. सुमन यादव के साथ उन्होंने इसे गाया भी. इस तरह अपने आप में अनूठी स्वरांजलि कवि भवानी प्रसाद मिश्र को दी गयी.
राजेंद्र बोड़ा ने पढ़कर सुनाया मिश्र का गीत
पत्रकार राजेंद्र बोड़ा ने कवि कवि भवानी प्रसाद मिश्र के गीत 'मै गीत बेचता हूँ' को पढ़कर सुनाया . बोड़ा के गीत को सुनाने का अंदाज़ संगीत रसिकों को बहुत भाया और सबने इसकी मुक्त कंठ से प्रंशंसा की. उन्होंने मिश्र की एक और कविता का भी पाठ किया.
अब तक का सबसे अच्छा कार्यक्रम: नंदिता
कवि नन्द किशोर आचार्य से पिता की स्मृतियाँ सुनकर समारोह में उपस्थित उनकी पुत्री नंदिता भावुक हो गयीं। वो खड़ी हुईं और बस इतना ही कह पाई कि उनके पिता कि स्मृति में हुए अब तक के कार्यक्रमों में यह सबसे अच्छा है. मुझे बहुत अच्छा लगा कि मैं इसका हिस्सा बनी.
Sunday, March 29, 2009
Saturday, February 21, 2009
मैं ऐसा क्यों हूँ?
मैं
क्यों बदल लेता हूँ भावना
किसी के प्रति/ एक क्षण मैं
किसी के एक कथन
एक कृत्य पर ।
क्यों भुला देता हूँ
उसके पिछले अच्छे काम को ।
क्यों डांप लेता हूँ
उसकी निष्ठा को
एक भूल पर ।
क्यों नही सोचता
क्यों किया होगा उसने ऐसा
क्या मजबूरी थी उसकी ।
लालच मैं तो किया न होगा
उसने यह कृत्य ।
यही गर करना होता उसे
तो कर चुका होता बहुत पहले ।
मोके क्या कम मिले होंगे उसको
मैंने तो छोड़ रखा था
ख़ुद को उसी के हवाले ।
फिर क्यों हुआ ऐसा ?
क्यों वो मेरा
आज पराया हो गया ।
मुझसे कोई भूल हुई है
या फिर मजबूरी है कोई उसकी ।
मुझे जानना होगा यह
और साथ देना होगा
ऐसे वक्त मैं उसका
ताकि वह हताश न हो
ख़ुद को समझ कर अकेला ।
उबर सके इस हादसे से
फिर आ सके उसी राह
जिस पर उसने पहला कदम रखा था
विश्वाश और प्रेम का ।
शिवराज गूजर
क्यों बदल लेता हूँ भावना
किसी के प्रति/ एक क्षण मैं
किसी के एक कथन
एक कृत्य पर ।
क्यों भुला देता हूँ
उसके पिछले अच्छे काम को ।
क्यों डांप लेता हूँ
उसकी निष्ठा को
एक भूल पर ।
क्यों नही सोचता
क्यों किया होगा उसने ऐसा
क्या मजबूरी थी उसकी ।
लालच मैं तो किया न होगा
उसने यह कृत्य ।
यही गर करना होता उसे
तो कर चुका होता बहुत पहले ।
मोके क्या कम मिले होंगे उसको
मैंने तो छोड़ रखा था
ख़ुद को उसी के हवाले ।
फिर क्यों हुआ ऐसा ?
क्यों वो मेरा
आज पराया हो गया ।
मुझसे कोई भूल हुई है
या फिर मजबूरी है कोई उसकी ।
मुझे जानना होगा यह
और साथ देना होगा
ऐसे वक्त मैं उसका
ताकि वह हताश न हो
ख़ुद को समझ कर अकेला ।
उबर सके इस हादसे से
फिर आ सके उसी राह
जिस पर उसने पहला कदम रखा था
विश्वाश और प्रेम का ।
शिवराज गूजर
Thursday, February 19, 2009
मेरा शहर
न मात्राओं का गणित है और न ही शब्दों की बंदिश, यह भावनाएं हैं जो चंद लाइनों मैं ब्लॉग पर हैं, इसलिए पड़ते समय भावनाओं को समझें -
यह शहर नही है, अब इंसानों का शहर
हेवानियत हर और यहाँ आती है नजर
बहन-बेटियों की अस्मत घर मैं नही सलामत
कत्लगाह बन गया हैअब तो ख़ुद का ही घर
प्रेमी छूपाते हैं प्रेम को, राखी की आड़ मैं
शेतानियत का ऐसा यहाँ बरपा है कहर
बाकी नही रहा इंसा मैं थोड़ा भी भाईचारा
हवाओं मैं ऐसा घुल गया है साम्प्रदायिकता का जहर
यह शहर नही है, अब इंसानों का शहर
हेवानियत हर और यहाँ आती है नजर
बहन-बेटियों की अस्मत घर मैं नही सलामत
कत्लगाह बन गया हैअब तो ख़ुद का ही घर
प्रेमी छूपाते हैं प्रेम को, राखी की आड़ मैं
शेतानियत का ऐसा यहाँ बरपा है कहर
बाकी नही रहा इंसा मैं थोड़ा भी भाईचारा
हवाओं मैं ऐसा घुल गया है साम्प्रदायिकता का जहर
Wednesday, February 18, 2009
ऐसी भी क्या जल्दी है
शास्त्री नगर जाने वाली बस देख रामबाग पर खड़े शर्माजी एकदम से अलर्ट हो गए । बस मैं पैर रखने की भी जगह नही थी, ऐसे मैं जब शर्माजी दोड़ कर बस मैं चड़ने लगे तो कंडेक्टर ने उन्हें रोकने की कोशिश करते हुए कहा,
बिल्कुल भी जगह नही है भाई साहब । पीछे वाली मैं आ जाना ।
जब तक उसकी बात पूरी हुई शर्माजी भीड़ के बीच मैं फंसा चुके थे अपनी बोडी । एक पैर तो हवा मैं लटका हुआ चिल्लाता ही रह गया था मैं कहाँ टिकू ।
ऐसी भी क्या जल्दी है, पीछे वाली बस मैं आ जायें, जब जगह नही है तो जान जोखिम मैं डालने से क्या फायदा,
अगली सवारी को बस मैं चढ़ता देख शर्माजी बडबडा रहे थे ।
शिवराज गूजर
बिल्कुल भी जगह नही है भाई साहब । पीछे वाली मैं आ जाना ।
जब तक उसकी बात पूरी हुई शर्माजी भीड़ के बीच मैं फंसा चुके थे अपनी बोडी । एक पैर तो हवा मैं लटका हुआ चिल्लाता ही रह गया था मैं कहाँ टिकू ।
ऐसी भी क्या जल्दी है, पीछे वाली बस मैं आ जायें, जब जगह नही है तो जान जोखिम मैं डालने से क्या फायदा,
अगली सवारी को बस मैं चढ़ता देख शर्माजी बडबडा रहे थे ।
शिवराज गूजर
Sunday, February 15, 2009
यूँ भी होता है
गोद मैं बच्चा लिए व हाथ मैं झोला लटकाए एक ग्रामीण महिला बस मैं चडी, सीट खाली नही देख एक दम से वह निराश हो गयी, फिर भी जैसा कि बस मैं चड़ने वाला हर यात्री सोचता है कि शायद किसी सीट पर अटकने कीजगह मिल जाए, वह भी पीछे की और चली, तभी उसकी नजर एक सीट पर पड़ी , उस पर बस एक युवक बेठा था, आंखों मैं संतोष की चमक आ गयी, पास जाने पर जब उस पर कोई कपडा या कुछ सामान नही दिखायी दिया तो उसने धम्म से शरीर को छोड़ दिया सीट पर,
अरे रे कहाँ बेठ रही हो, यहाँ सवारी आएगी,
आंखों मैं उभरी चमक घुप्प से गायब हो गयी , आगे और सीट देखने की हिम्मत उसमें नही रही और वह वहीं सीटों के बीच गैलरी मैं ही बेठ गयी, इसके बाद उस खालीसीट को देख कर कईं आंखों मैं चमक आती रही और बुझती रही,
तभी एक युवती बस मैं चडी , अन्य लोगों को खड़ा देख उसने समझ लिया कि वह सीट खाली नही है, कोई आएगा, नीचे गया होगा, टिकेट या फिर कूछ लेने , और वह भी खड़ी हो गयी महिला के पास,
बेठ जाइये न, यहाँ कोई नही आएगा, इस आवाज पर युवती ने मुड़कर देखा तो युवक उससे ही मुखातिब था,
उसने आश्चर्य से पूछा कोई नही आएगा,
जी नही, युवक उसी मुस्कान के साथ बोला,
इस पर युवती मुडी और नीचे बेठी उस बच्चे वाली महिला को वहां बेठा दिया,
अब युवक का चेहरा देखने लायक था, वह युवती को खा जाने वाली नजरों से देख रहा था,
शिवराज गूजर
अरे रे कहाँ बेठ रही हो, यहाँ सवारी आएगी,
आंखों मैं उभरी चमक घुप्प से गायब हो गयी , आगे और सीट देखने की हिम्मत उसमें नही रही और वह वहीं सीटों के बीच गैलरी मैं ही बेठ गयी, इसके बाद उस खालीसीट को देख कर कईं आंखों मैं चमक आती रही और बुझती रही,
तभी एक युवती बस मैं चडी , अन्य लोगों को खड़ा देख उसने समझ लिया कि वह सीट खाली नही है, कोई आएगा, नीचे गया होगा, टिकेट या फिर कूछ लेने , और वह भी खड़ी हो गयी महिला के पास,
बेठ जाइये न, यहाँ कोई नही आएगा, इस आवाज पर युवती ने मुड़कर देखा तो युवक उससे ही मुखातिब था,
उसने आश्चर्य से पूछा कोई नही आएगा,
जी नही, युवक उसी मुस्कान के साथ बोला,
इस पर युवती मुडी और नीचे बेठी उस बच्चे वाली महिला को वहां बेठा दिया,
अब युवक का चेहरा देखने लायक था, वह युवती को खा जाने वाली नजरों से देख रहा था,
शिवराज गूजर
Thursday, February 12, 2009
अब तो शिकवा न करना मुझसे
पैदा होते ही
लग जाता है ठप्पा
जिस पर मनहूस का
भेदभाव बरता जाता है
जिसकी परवरिश मैं
हर पल
हर जरूरत के लिए
मारना पड़ता है मन को
बदन पर चुभती अनगिनत आँखें
भूखे गिद्ध की तरह
अपनों की परायों की
हर कदम पर बंदिशें
उम्र के फेलाव के साथ
बढता, बंदिशों का सिलसिला
इसी क्रम मैं
बाँध दिया जाता है
निरीह पशु की भांति
किसी अनजान दडबे के खूंटे से
कहते हुए की
अब यही तुम्हारी दुनिया है
निर्विरोध अंगीकार कर इस थोप को
डाल लेती है ख़ुद को
इस अनजान माहोल मैं
इस आशा के साथ
की शायद
इस हमसफ़र से ही मिल जाए
स्नेह थोड़ा
मगर
टूट जाता है, यह भरम भी
कुछ ही दिनों के चक्र मैं
जब पूरी नही होती मांगें उनकी
तो उडेल दी जाती है केरोसिन की पीपी
और दिखा दी जाती है दियासलाई
पल मैं जीती -जागती मूरत
बदल जाती है राख मैं
यह कहते, देख बापू
नही लगाया बट्टा तेरी शान को
तूने कहा था, वहाँ से तेरी अर्थी उठे
देख लो, उठ रही है
अब तो शिकवा न करना मुझसे
निभा दिया मैंने तेरा वचन
पैदा होने से लेकर मरने तक
शिवराज गूजर
लग जाता है ठप्पा
जिस पर मनहूस का
भेदभाव बरता जाता है
जिसकी परवरिश मैं
हर पल
हर जरूरत के लिए
मारना पड़ता है मन को
बदन पर चुभती अनगिनत आँखें
भूखे गिद्ध की तरह
अपनों की परायों की
हर कदम पर बंदिशें
उम्र के फेलाव के साथ
बढता, बंदिशों का सिलसिला
इसी क्रम मैं
बाँध दिया जाता है
निरीह पशु की भांति
किसी अनजान दडबे के खूंटे से
कहते हुए की
अब यही तुम्हारी दुनिया है
निर्विरोध अंगीकार कर इस थोप को
डाल लेती है ख़ुद को
इस अनजान माहोल मैं
इस आशा के साथ
की शायद
इस हमसफ़र से ही मिल जाए
स्नेह थोड़ा
मगर
टूट जाता है, यह भरम भी
कुछ ही दिनों के चक्र मैं
जब पूरी नही होती मांगें उनकी
तो उडेल दी जाती है केरोसिन की पीपी
और दिखा दी जाती है दियासलाई
पल मैं जीती -जागती मूरत
बदल जाती है राख मैं
यह कहते, देख बापू
नही लगाया बट्टा तेरी शान को
तूने कहा था, वहाँ से तेरी अर्थी उठे
देख लो, उठ रही है
अब तो शिकवा न करना मुझसे
निभा दिया मैंने तेरा वचन
पैदा होने से लेकर मरने तक
शिवराज गूजर
Monday, February 9, 2009
गीत
गाँव से मेरा ख़त आया है
पढके यार सुनना तुम
कैसे है घरवाले मेरे
सबका हाल बताना तुम
माँ -बापूजी लिखते हैं
कैसे हो लाल हमारे तुम
दूर हो हमसे तो क्या बेटे
यादों मैं पास हमारे हो तुम
हम तो सब खुस हैं यहाँ पर
लिखना हाल तुम्हारा तुम
गाँव से .............
बहना लिखती है भइया मेरे
क्या तुम हमको भूल गए
घर, आँगन, गलियां, चौबारे
क्या तुम सबको भूल गए
शहर मैं जाकर भइया क्या
भूल गए हो प्यार हमारा तुम
गाँव से .................
भाई तुम्हारा छोटा लिखता है
भइया क्यों तड़पाते हो
याद तुम्हारी आती है
फिर क्यों नही तुम आते हो
अबके ख़त मैं लिखना भइया
कब आ रहे हो घर पर तुम
गाँव से ...............
शिवराज गूजर
पढके यार सुनना तुम
कैसे है घरवाले मेरे
सबका हाल बताना तुम
माँ -बापूजी लिखते हैं
कैसे हो लाल हमारे तुम
दूर हो हमसे तो क्या बेटे
यादों मैं पास हमारे हो तुम
हम तो सब खुस हैं यहाँ पर
लिखना हाल तुम्हारा तुम
गाँव से .............
बहना लिखती है भइया मेरे
क्या तुम हमको भूल गए
घर, आँगन, गलियां, चौबारे
क्या तुम सबको भूल गए
शहर मैं जाकर भइया क्या
भूल गए हो प्यार हमारा तुम
गाँव से .................
भाई तुम्हारा छोटा लिखता है
भइया क्यों तड़पाते हो
याद तुम्हारी आती है
फिर क्यों नही तुम आते हो
अबके ख़त मैं लिखना भइया
कब आ रहे हो घर पर तुम
गाँव से ...............
शिवराज गूजर
Sunday, February 8, 2009
उम्मीद और सपने
दो चीजें
पीछा करती हैं हमेशा
इंसान का
उम्मीद और सपने
सपने होते हैं उसके अपने
उमीदें होती हैं उससे दूसरों को
दम तोड़ देते हैं सपने
हमेशा उमीदों के आगे
क्योंकि
वक़्त लगता है
सपनों के पूरे होने मैं
जबकि
उमीदें साथ होती हैं
हरपल
जो अहसास कराती हैं
उसे अपने होने का
किसी से बंधे होने का
पसोपेश मैं पड़ गया है मन
इस दोराहे पर आकर
एक तरफ़ मेरे सपने हैं
दूसरी और हैं उनकी उमीदें
सोचता हूँ
सपने तो मेरे अकेले के हैं
उमीदें मुझसे कितनो को हैं
माँ -बापू को
क्योंकि बेटा हूँ उनका
पाला - पोसा है मुझे
यह सोच कर
सहारा बनूँगा बुडापे मैं
उमीदें हैं, बीवी - बचों को
क्योंकि
पालनहार हूँ मैं उनका
तो फिर क्या अहमियत है
मेरे सपनों की
उनकी उमीदों के आगे
पर
मुझे भी तो वक़्त चाहिए
उनकी उमीदों पर खरा उतरने के लिए
क्या मैं कर सकता हूँ उनसे
कुछ और समय की
उम्मीद
शिवराज गूजर
पीछा करती हैं हमेशा
इंसान का
उम्मीद और सपने
सपने होते हैं उसके अपने
उमीदें होती हैं उससे दूसरों को
दम तोड़ देते हैं सपने
हमेशा उमीदों के आगे
क्योंकि
वक़्त लगता है
सपनों के पूरे होने मैं
जबकि
उमीदें साथ होती हैं
हरपल
जो अहसास कराती हैं
उसे अपने होने का
किसी से बंधे होने का
पसोपेश मैं पड़ गया है मन
इस दोराहे पर आकर
एक तरफ़ मेरे सपने हैं
दूसरी और हैं उनकी उमीदें
सोचता हूँ
सपने तो मेरे अकेले के हैं
उमीदें मुझसे कितनो को हैं
माँ -बापू को
क्योंकि बेटा हूँ उनका
पाला - पोसा है मुझे
यह सोच कर
सहारा बनूँगा बुडापे मैं
उमीदें हैं, बीवी - बचों को
क्योंकि
पालनहार हूँ मैं उनका
तो फिर क्या अहमियत है
मेरे सपनों की
उनकी उमीदों के आगे
पर
मुझे भी तो वक़्त चाहिए
उनकी उमीदों पर खरा उतरने के लिए
क्या मैं कर सकता हूँ उनसे
कुछ और समय की
उम्मीद
शिवराज गूजर
Saturday, February 7, 2009
Thursday, February 5, 2009
दुनियादारी
ना थारी छे, ना म्हारी छे
या दुनिया भाया दारी छे
गरज पड्यां सूं गुड बण ज्या
काम निकलता ही खारी छे
या दुनिया......
आंटी मैं पीसा हो तो
जग बण जावे भाएलो
लक्ष्मीजी जद घर छोड़े
कुण नाती, कुणकी यारी छे
या दुनिया......
पूत कमाऊ हो घर मैं तो
सबने लगे प्यारो सो
बेरुजगार घूमतो बेटो
लागे सबने बेरी छे
या दुनिया......
शिवराज गूजर
या दुनिया भाया दारी छे
गरज पड्यां सूं गुड बण ज्या
काम निकलता ही खारी छे
या दुनिया......
आंटी मैं पीसा हो तो
जग बण जावे भाएलो
लक्ष्मीजी जद घर छोड़े
कुण नाती, कुणकी यारी छे
या दुनिया......
पूत कमाऊ हो घर मैं तो
सबने लगे प्यारो सो
बेरुजगार घूमतो बेटो
लागे सबने बेरी छे
या दुनिया......
शिवराज गूजर
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